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अखलाक का गुड़ और गांव का बछड़ा

Byadmin

Nov 21, 2020

अखलाक का गुड़ और गांव का बछड़ा
(लघुकथा)

ये कहानी एक गांव की है जिसमें 4-5 मुस्लिम परिवार रहते थे । उनके इर्द गिर्द और आसपास राजपूतों के 40-50 परिवार थे । उस राजपूत टोले के बाहर भी जो बड़े बड़े गांव थे वहां भी हिंदुओं… खासकर राजपूतों का ही बसेरा था । कुल मिलाकर वो पूरा इलाका किसी मिनी चित्तौड़गढ़ से कम नहीं था ।

गांव में सामाजिक समरसता का पूरा माहौल था । गांव में कुछ हिंदू लड़के ऐसे भी थे जिनके परिवार में मांस-मछली-चिकन-मटन सब पूरी तरह से प्रतिबंधित थे । चिकन मटन के ऐसे शौकीन लड़कों की पड़ोस में रहने वाले कलीम मियां के बेटों से बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी । कलीम मियां के यहां के चिकन की आदत इन नवयुवकों की स्वादग्रंथियों को लग चुकी थी । खैर इसी तरह धीरे-धीरे पूरे इलाके में एक जबरदस्त धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता का माहौल बना हुआ था ।

भारत में आने वाले तमाम मुस्लिम यात्रियों ने ये लिखा हुआ है… खास तौर पर इतिहासकार इब्नबतूता ने भी जिक्र किया है कि भारत में रहने वाले हिंदू… मुसलमानों के घरों का पानी भी नहीं पीते थे । भारत भ्रमण करने वाले एक फ्रांसीसी यात्री अफसीनी निकतिनी ने तो अपने यात्रा वृतांत में यहां तक लिख दिया कि अगर अचानक कोई मुसलमान किसी ऐसे ब्राह्मण के सामने पड़ जाए जो खाना खा रहा हो तो वो ब्राह्मण खाना दूषित मानकर खाने से उठ जाया करता था । लेकिन सैकड़ों सालों के बाद इस्लाम ने अपनी जगह हिंदुस्तान में बना ली । अब चिकन-मटन और मांस के बने व्यंजन भारत के छोटे छोटे इलाकों में धर्मनिर्पेक्षता और सहिष्णुता की नींव बन गए थे ।

उसी गांव में एक प्रौढ़ रह रहा था जिसका नाम था… अखलाक । अखलाक हाल ही में पाकिस्तान से लौट कर आया था । और उसको बछड़ों से काफी लगाव था । ऐसा ही एक बछड़ा उस गांव के राजपूतों ने भी पाला हुआ था । परंपरा के तहत बछड़े को नंदी बनाने की योजना थी । इसलिए वो बछड़ा छुट्टा होकर पूरे गांव में घूमता था । अखलाक भी रोज़ उस बछड़े को गुड़ खिलाया करता था । आसपास के लोग इसे देखकर भारत के दक्षिणपंथी संगठनों को गालियां दिया करते थे… देखो कितना पाक और ईमान वाला मुसलमान है । इतना भाईचारा… गोवंश का इतना सम्मान… तो कोई हिंदू भी नहीं करता है ।

दिन सुख चैन से बीतते जा रहे थे… अखलाक मियां के पड़ोस में रहने वाले जुम्मन मियां की पांच बेटियां थीं । वो किसी तरह पंचर की दुकान चलाकर अपनी रोजी रोटी चला रहा था । लेकिन बड़ी मुश्किल से अपनी चार बेटियों का ही निकाह कर पाया था । पांचवी बेटी का निकाह कैसे हो ये चिंता जुम्मन मियां को खाए जा रही थी । आखिरकार उन्होंने गांव के मुखिया ठाकुर राजेंद्र सिंह से मुलाकात की । बात ही बात में उनके मुंह से ये बात निकल गई कि पता नहीं बेटी का निकाह कर पाऊँगा या नहीं ? गांव के मुखिया राजेंद्र सिंह ने कहा… अरे इसमें कौन सी परेशानी है ? हम ठाकुर लोग हैं ? तुम्हारी बेटी हमारी भी बेटी है ? हम करवाएंगे निकाह ? फिर क्या था ? मुखिया जी के कहते ही… पूरे इलाके में राजपूतों ने चंदा इकट्ठा कर दिया । अनाज… दहेज… शादी श्रृंगार का समाना… कपड़े लत्ते… बर्तन किसी चीज़ की कमी नहीं । जुम्मन मियां की आखिरी बेटी का निकाह भी संपन्न हो गया । निकाह में उस वक्त की सरकार में शामिल एक मंत्री महिपाल जादो भी शामिल हुए । सारे राजपूतों और आसपास से आई मुसलमान बिरादरी ने महिपाल जी को आश्वासन दिया कि भैया यहां… पूरा जबरदस्त वाला भाईचारा है… आप निश्चिंत रहें… एक-एक वोट समाजजन पार्टी को पड़ने वाला है… एकदम मस्त होकर जाइए आप । उधर अखलाक मियां अपने रोजाना की दिनचर्या में लगा रहा । उसने एक दिन भी नागा नहीं किया… रोज बछड़े को अपने हाथों से गुड़ खिलाने का काम जारी रखा । वो बछड़ा भी अखलाक मियां को देखते ही गुड़ खाने के लिए हमेशा उसके पीछे पीछे चल पड़ता था ।

आखिर बकरीद का दिन आया । मुसलमानों के परिवारों में खुशियां मनाई जाने लगीं । मांस के शौकीन कुछ हिंदू युवकों की भी स्वाद ग्रंथियां कुलबुलाने लगीं । अखलाक ने भी अपने घर में मांस पकवाया और सबको न्यौता दे दिया । मटन खाने के लिए सभी सहिष्णु और सेकुलर हिंदू लोग अखलाक मियां के यहां आए । उस दिन वो बछड़ा जिसे गांव में नंदी बनने के लिए छोड़ा गया था… कहीं नज़र नहीं आ रहा था । उस बछड़े की तलाश चल रही थी । बहरहाल मटन परोसा जाने लगा… अखलाक मन ही मन मुसकरा रहा था । सबने डकार ली और चलने को उठे ही थे कि तभी कुछ लोगों ने ये खबर लाई कि वो बछड़ा जिसे नंदी बनाने के लिए छोड़ा गया था… मरा हुआ मिला है… बछड़े का मांस निकाल लिया गया है… फिर क्या था ? अचानक लोगों को शक हो गया ? किसी ने बीच में से ही कहा… आखिरी वक्त देखा था… अखलाक ही बछड़े को गुड़ खिला रहा था… अखलाक से पूछताछ शुरू हुई… उसके फ्रिज की तलाश भी शुरू हुई आखिर क्या खिला दिया… बकरा या गाय का गोश्त ?

हो गया पाप… हल्ला मच गया । हंगामा हुआ । फिर भीड़ इकट्ठी हो गई… बहुत कुछ हो गया… जो IPC के खिलाफ था । अखलाक की फ्रिज में मौजूद मांस का सेंपल सरकारी आदमी ले गए । मथुरा की फॉरेंसिक लैब में जांच से ये पता चला कि वाकई में अखलाक के फ्रिज में बीफ ही था । यानी गुड़ खिलाकर जिस बछड़े को जाल में फंसाया गया था वो ही कुर्बान कर दिया गया… पाक मौके पर । बाद में सूरजपुर की एक जिला अदालत ने अखलाक और उसके परिवार के सदस्यों पर गोहत्या का मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया । लेकिन ये बात पूरी तरह दब गई क्योंकि उस वक्त की सरकार भाईचारा बढाना चाहती थी इसलिए उसने मथुरा की रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया । लेकिन लोग इस बात पर आश्चर्य करने लगे कि सैकड़ों हिंदू परिवारों के बीच रहने वाले सिर्फ 5 मुस्लिम परिवारों में से एक ने इतनी हिम्मत कर ली कि हिंदुओं को ही धोखे से गोवंश खिला दिया ।

अब अदालत में पेशी शुरू हुई… हत्या का मुकदमा चलने लगा… झूठे केस बनाए गए… गांव के मुखिया राजेंद्र सिंह के बेटों पर भी केस बना दिया गया और अखलाक की तरफ से गवाही देने के लिए आया जुम्मन… । अब सेक्युलरिज्म और धर्मनिर्पेक्षता के आदर्श हवा हवाई हो गए । बाद में कुछ अखबारों में खबरें छपीं कि अखलाक तो मासूम था वो जब पाकिस्तान गया तो किसी मौलाना ने उसको भड़का दिया था ।

(इस लघुकथा का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है)

संपादक

प्रज्ञा शर्मा

मुरैना (ग्वालियर) म0प्र0

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