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आज की वर्तमान भारतीय राजनीति में भारतीय जनसंघ की अति आवश्यकता क्यों?

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Dec 6, 2020

आज की वर्तमान भारतीय राजनीति में भारतीय जनसंघ की अति आवश्यकता क्यों?

आज भाजपाई जो अपने आप को जनसंघ कहते.हैं डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, प्रोफेसर बलराज मधोक, पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुयाई कहलाते है वास्तव में वह लोग कांग्रेस का बदला हुआ स्वरूप कांग्रेसियों युक्त भाजपा तथा कांग्रेसियों की गांधीवादी विचारधारा और अंबेडकरवादी विचारधारा के अनुयाई हैं वर्तमान में भेड़ की खाल में भेड़िया देश को नोच रहे हैं इसीलिए आज समाज को एक कट्टर हिंदुत्व की आवाज उठाने वाली पार्टी भारतीय जनसंघ की आवश्यकता पड़ी है
भाजपा के ‘पी एम नरेंद्र भाई मोदी पार्टी की रैलियों में कांग्रेसमुक्त भारत बनाने का आह्वान कर रहे हैं. अटल जी प्रधानमंत्री बनने से पूर्व जनादेश मांगते हुए रोचक अंदाज में कहते थे- ‘कांग्रेस को विश्राम की आवश्यकता है. अब थोड़ा आराम दीजिए कांग्रेस को, कांग्रेस थक गयी है.’ लेकिन, मोदी के अनुसार कांग्रेस थक नहीं सड़ चुकी है.

भ्रष्टाचार, वंशवाद, सिद्धांतहीन अनैतिक राजनीति वगैरह इसके सड़ांध से निकलते मवाद है, जिसकी दुर्गध पूरे राजनीतिक जीवन को बुरी तरह प्रदूषित कर रही है. इसलिए मोदी को कांग्रेस मुक्त भारत से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है. होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि जनसंघ के समय से ही पार्टी देश की मूलभूत समस्याओं के लिए कांग्रेस की गलत नीतियों को ही उत्तरदायी मानती रही है. चाहे वह देश-विभाजन की बात हो या देश की एकता-अखंडता पर मंडराते खतरे, सीमाओं की सुरक्षा के प्रश्न हों या देश की सामरिक विफलता या फिर देश की आर्थिक बदहाली या विफल विदेश नीति-संघ, जनसंघ और भाजपा इसके लिए कांग्रेस को ही जिम्मेवार बतलाते रहें हैं. महंगाई, भ्रष्टाचार या पतनोन्मुख सार्वजनिक जीवन, भाजपा ने इन सबकी जड़ में कांग्रेस प्रणीत राजनीतिक अपसंस्कृति को ही कारण भूत बतलाया.
मोदी जी का कहना है कि कांग्रेस मुक्त भारत ही एक समृद्ध, शक्तिशाली एवं स्वाभिमानी राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा. इसलिए नरेंद्र मोदी भारत को वैसे ही कांग्रेस मुक्त बनाना चाहते हैं जैसे गांधी जी ने देश को अंगरेजों से या फिर सरदार पटेल ने हैदराबाद को निजामशाही से मुक्त कराया था.
कहना नहीं होगा कि देश को अधोगति में ले जाने में कांग्रेस की भ्रष्ट रीति-नीति का अहम रोल है. सो मोदी द्वारा कांग्रेस मुक्त भारत का आह्वान भाजपा कार्यकर्ताओं को उद्धेलित करता है.

यह आह्वान सामयिक भी है, लेकिन यहीं पर सोचने वाली बात यह है कि देश कांग्रेस मुक्त होगा तो कैसे? कौन-सी पाटी तात्विक रूप से गुणधर्म में कांग्रेस से अलग है? सच तो यह है कि आज के माहौल में कांग्रेस सर्वव्यापी है, सर्वस्पर्शी है. कांग्रेस के ‘रूप’ अनेक है और ‘गुण’ भी. कांग्रेस ‘सगुण-साकार’ है तो ‘निगरुण-निराकार’ भी. जैसे रासलीला के समय श्रीकृष्ण सभी गोपियों के साथ प्रकट हुए,

वैसे ही आज की सियासतलीला में कांग्रेस के लक्षण सभी दलों में विद्यमान है. कांग्रेस मुक्ति के सपने दिखलाने वाले नरेंद्र मोदी की पार्टी भारतीय जनता पार्टी में तो सोलहों कलाओं से! वह कैसे? ठीक वैसे ही, जैसे हिंदू धर्म नहीं, संस्कृति है (जो कि संघ में पढ़ाया जाता है और यही यथार्थ भी है) वैसे ही कांग्रेस भी दल नहीं, संस्कृति है. कांग्रेस संस्कृति! छल-प्रपंच, पाखंड, टांग-खिंचाई, चापलूसी, भ्रष्टाचार, वंशवाद, पद-पैसे के लिए मारामारी-ये कांग्रेस संस्कृति के नानाविध अलंकार है. क्या आज मोदी जी की भाजपा इन ‘बहुमूल्य अलंकरणों’ से विभूषित हो अपनी शोभा में चार चांद नहीं लगा रही? आज इन समस्त कांग्रेस ‘सदगुणों’ का परकाया प्रवेश भाजपा में गहराई तक हो गया है.

भाजपा से जनसंघ की आत्मा कब की निकल चुकी है और कांग्रेस की रूह इसमें प्रविष्ट हो गयी है.

भाजपा के आंगन में भ्रष्ट कांग्रेस कल्चर का बदबूदार पनाला बह रहा है. इस तथ्य का अहसास पार्टी के समस्त समर्पित कार्यकर्ताओं को है, लेकिन वे असहाय हैं, निरूपाय हैं. क्योंकि पार्टी की दशा और दिशा तय करने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही, भले ही भाजपा कार्यकर्ताओं की पार्टी कहलाती है.

भाजपा खुद को ‘काडर बेस पार्टी’ कहती है. कम्युनिस्टों की तरह. काडर बेस पार्टियों में हर स्तर पर नेतृत्व काडर ही करता है. योग्यता, क्षमता और विचारधारा के प्रति समर्पण के आधार पर पार्टी काडर पदानुक्रम में स्थान पाता है.
पार्टी के फैसले काडर-समूह के सलाह मशविरे पर ही होते हैं. चुनावों में उम्मीदवारों का चयन भी इसी प्रक्रिया से होता है. लेकिन क्या आज भाजपा में काडर या कार्यकर्ताओं की कोई अहमियत बची है? नहीं बिल्कुल नहीं. यहां वर्षो-दशकों से दल के लिए जीने-मरने वाला कार्यकर्ता वर्ग केवल चुनावों में उपयोग की वस्तु है. ‘यूज एंड थ्रो’! आज तो पार्टी के नेता आयातित होते हैं जो दूसरी पार्टियों के गटर से निकल कर भाजपा के बेडरूम में आ सुशोभित हो जाते हैं.

नेतृत्व-निर्धारण या उम्मीदवारों के चयन में पार्टी काडर का कोई रोल नहीं, यह तो ऊपर से तय होता है. देखिए लोकसभा चुनाव की आहट होते ही दूसरे दलों के घाघ नेता और कई प्रशासनिक अधिकारी जो भ्रष्टाचारी संस्कृति के वाहक रहे, भाजपा से उम्मीदवारी पर गिद्ध दृष्टि गड़ाये थे. ये पार्टी के बड़े नेताओं को पटाने में लग गये थे। और अन्त में टिकट पाने में कामयाब भी हो गये हैं।

प्रदेश से लेकर केंद्र तक के बड़े नेताओं को ऐसे लोग पार्टी के संगठन मंत्रियों और संघ के माननीय अधिकारियों और प्रचारकों की परिक्रमा में लगे हैं. नमो मंत्र के जाप के साथ भाजपा संगठन मंत्री और संघ प्रचारकों की इतनी पूजा, इतनी प्रदक्षिणा, इतनी अभ्यर्थना कि ‘आजकल इनके पांव जमीं पे पड़े नहीं’, समर्पित कार्यकर्ताओं के बदन से इनको मानो बदबू आती है और दूसरे दलों से टपके अवसरवादियों से खुशबू. अब ये अवसरवादी लोग रातोरात झंडे-नारे और टोपियां बदल कर और खाकी नेकर पहन कर संघी और भाजपाई हो जायेंगे.
वर्षो से संघ की शाखाओं में दक्ष-आरम् करने वाले और भाजपा के बुरे दौर से ही पार्टी के झंडे ढोने वाले टुकुर-टुकुर देखते रह जायेंगे. और भाजपा काडर अपने इन आयातित भाग्यविधाताओं की पालकी ढोने को मजबूर होगा. अगर कार्यकर्ता नाराजगी प्रकट करेंगे तो संघ के माननीयों की बौद्धिक नसीहतें मिलेगी. ‘अच्छे बच्चे हल्ला नहीं करते’ इसके बाद भी अगर ज्यादा फड़फड़ाये तो कथित अनुशासन की छुरी चला कर पंख कतर दिये जायेंगे.
ये कोई कोरी कल्पना नहीं है- हजारीबाग, गोड्डा और गिरिडीह संसदीय क्षेत्रों में ऐसा पहले हो चुका है जहां उड़ते पंछी दशकों तक संघ-साधना में लगे या भाजपा में जीवन खपाने वालों के टिकट झटक कर चलते बने. बाकी पूरे भारतवर्ष में हर जगहों पर भी यही नजारा देखने को मिलेगा. यही तो कांग्रेस-परिपाटी है, कांग्रेस कल्चर! फिर तो बेईमानी की कांग्रेसी-संस्कृति के रास्ते सत्ता में आयी कोई पार्टी कैसे दावा कर सकती है कि वो कांग्रेस मुक्त भारत बनायेगी? क्या कोई नशेड़ी नशामुक्त परिवार या समाज बनाने का दावा कर सकता है?

आज भाजपा चाल-चरित्र चेहरे में कांग्रेस से कतई अलग नहीं. कांग्रेस की ही भांति भाजपा में बेईमानी की संस्कृति सिर चढ़ कर बोल रही. चंदे, आय-व्यय वगैरह में कोई पारदर्शिता नहीं.

वह कुशाभाऊ ठाकरे जी, सुंदर सिंह भंडारी जी और कैलाश जी का जमाना था जबकि पार्टी के नाम पर लूट-खसोट, झाड़-झपट को सं™ोय अपराध माना जाता था. ये महापुरुष स्वयं संयमी और खांटी ईमानदार थे. पाई-पाई का हिसाब-किताब रखते थे.
जोड़ी-दो जोड़ी धोती-कुरते और पुस्तकों के अलावा उनके पास कोई संचय नहीं होता था. किसी ने कुछ वस्त्रदि दान दे दिया तो वे इसे कार्यकर्ताओं को दे देते थे. अपरिग्रह की प्रतिमूर्ति थे वे. यही स्वभाव नीचे तक संचरित होता था. इसलिए कार्यकर्ता भी चरित्रवान और ईमानदार होते थे. बेइमानों का पार्टी में टिकना मुश्किल था.

आज तो यहां ईमानदारों का रहना दुष्कर हो रहा है. ‘खाता न बही, जो मोदी शाह कहें वो सही’ यह कांग्रेस में चलता था. आज यही प्रचलन भाजपा में है. जब पार्टी में गंगोत्री शुद्ध थी तो गंगा भी. आज तो भाजपा में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक प्रदूषण का विप्लव है. पापियों के पाप धोते-धोते भाजपा रूपी गंगा हर रोज मैली ही होती जा रही है. सो 2014 में कांग्रेस का उखाड़ कर भाजपा के सत्तासीन होने से तात्विक रूप से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. भले भाजपा दावा करे कि वह ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ (!) है. जब पार्टी के रग-रग में भ्रष्ट कांग्रेस का डीएनए घुल रहा हो तो कांग्रेस मुक्त भारत का स्वप्न दिखलाना एक राजनीतिक प्रहसन के सिवा और क्या हो सकता है.

मोदी जी महात्मा गांधी के हवाले से कहते हैं कि गांधी जी ने स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को समाप्त कर देने को कहा था. ठीक है, गांधी जी चाहते थे कि स्वातंत्रयोत्तर भारत में शासन संचालन के लिए नये सिरे से दलीय पद्धति विकसित हो और जो भी शासन करे वे जनता के मालिक नहीं, सच्चे जनसेवक बनें. कांग्रेस के बारे में गांधी जी का विचार था कि वह लोकसेवा का समर्थ उपकरण बने और त्याग व सेवा द्वारा लोकशक्ति को सतत जाग्रत रखते हुए राजशक्ति को सन्मार्ग दिखलाती रहे.

वह कांग्रेस नाम की राजनीतिक संस्था समाप्त हो ताकि स्वाधीनता संघर्ष में इसके द्वारा अजिर्त साख को स्वार्थ में परिणत करने से रोका जा सके . कांग्रेस को समाप्त करने से गांधीजी का यही अभिप्राय था. लेकिन गांधी जी दुहाई देनेवाले नरेंद्र मोदी जी क्यों भूलते हैं कि ऐसी ही बात भारतीय जनसंघ के परम प्रेरणापुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जनसंघ के बारे में भी कही है. भाषा और शब्दावली में थोड़ा फर्क है, लेकिन भाव वही है.

दीनदयाल जी कोरे छिद्रान्वेषी न होकर गांधी जी की ही तरह सत्यशोधक और आत्मचिंतक भी थे. मैंने उन्हें एक बौद्धिक वर्ग में साफ-साफ कहते सुना है कि पूरी दक्षता बरतने के बावजूद जनसंघ में अगर भ्रष्टाचार आ जाता है तो उसे विसजिर्त कर देना चाहिए. आज तो भाजपाई भ्रष्टाचार कांग्रेसी भ्रष्टाचार को पछाड़ कर आगे निकल चुका है. पार्टी का पूरा तौर तरीका ही भ्रष्ट है संगठन चुनाव में पद हथियाने को लेकर भ्रष्टाचार. पार्टी में पद लेने-देने से लेकर चुनाव में टिकटों के वितरण में भ्रष्टाचार. ‘हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे’भाजपा की संस्कृति का अभिन्न अंग हो चुका है. तुम मुङो पैसे दो, मैं तुम्हें पद और टिकट दिलाऊंगा-यह पार्टी में जोरों से प्रचलित है.
अब बतलाइए कि इस हालत में पंडित दीनदयाल जी की बातों पर अमल करते हुए भाजपा के विसजर्न का वक्त आ गया है या नहीं?
दिसंबर 1980 में, मुंबई में भाजपा के प्रथम पूर्व अधिवेशन को संबोधित करते हुए भाजपा के शीर्ष पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक जीवन में पतनावस्था के लिए कांग्रेस पर प्रहार करते हुए कहा था कि राजनीति को नैतिक मूल्यों की पटरी पर लाना होगा. गांधी, दीनदयाल उपाध्याय और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचार भी ऐसे ही थे.
ये मनीषी जानते थे कि नैतिक आग्रह के बगैर सार्वजनिक जीवन का पतन हो जायेगा क्योंकि सत्ता का स्वभाव होता है-सत्ताधीशों को भ्रष्ट करना. इसलिए अटल जी ने उक्त अधिवेशन में ऐलान कर दिया था कि ‘पद, पैसा, प्रतिष्ठा के पीछे पागल होनेवालों के लिए हमारे यहां कोई जगह नहीं होगी’ लेकिन आज तो अवसरवादियों, दलघातियों, दलबदलुओं और धनपतियों के लिए यहां पलक-पावड़े बिछाये जाते हैं.

चार दशक से अधिक समय से संघ परिवार में हूं. एक बार परम पूजनीय श्री गुरुजी (गोलवलकर) के कार्यक्रम में रहा, उनके दिवंगत होने के पूर्व यह अंतिम कार्यक्रम था. एक जनसंघ कार्यकर्ता ने प्रश्न किया था कि राजनीति का मूल स्वभाव स्खलनशील है.

क्या गारंटी है कि जनसंघ इस प्रवृत्ति से बचा रहेगा? श्री गुरुजी ने बड़ा सटीक जवाब दिया. संघ के संस्कार ही जनसंघ को स्खलनशीलता से बचायेंगे. लेकिन सवाल है कि वे संस्कार आयें तो किधर से? श्री गुरुजी ने जिन संस्कारों की बात कही उसे ‘आज संघ के माननीयों में खोजना गदहे के सिर में सींग ढूंढ़ने के समान है.’ हम गीत गाया करते थे- ‘निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र-निर्माण न भूलें.’ आज चरित्र-निर्माण का कोरा बौद्धिक विलास चलता है संघ में.
भूत सरसों में गहराई तक घुस आया है. जिन पर भाजपा को संभालने व कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने का जिम्मा था, उनकी नैतिक कंगाली के दर्शन कर हम स्तब्ध हैं. चमचों, चापलूसों, दरबारियों और ठकुरसुहाती बतियाने वालों की पहुंच संघ दरबार में ऊंचाई तक है. अब कोई बतलाये कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का संघ संकल्प किसके भरोसे पूर्ण होगा. कैसे साकार होगा कांग्रेस-कुसंस्कारों से मुक्त भारत का गांधी जी का सपना, जिसका आह्वान माननीय नरेंद्र मोदी जी करते फिर रहे हैं? यह प्रश्न विचारणीय है.
एक समय में राजनीतिक अछूत समझी जाने वाली अभाजसंघ की स्वीकार्यता सम्पूर्ण देश में बढ़ रही है। अपनी बढ़ती स्वीकार्यता के इस दौर में भारतीय जनसंघ को दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन को अपने व्यवहार में लेकर चलना होगा।

जहां अब समय भाजपा से दीनदयाल दर्शन को छूटने का है।, वहीं वह राजनीतिक पटरी से फिसलकर रसातल में पहुँच जाएगी। क्योंकि, यह चिंतन ही भाजपा को ‘औरों से अलग’ पहचान दिलाता था। इसलिए भाजपानीत सरकारों को ध्यान रखना चाहिए था कि उनकी शासन व्यवस्था में ‘भारतीयता’ दिखनी ही चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में आये बदलाव के कारण भाजपा में दीनदयाल उपाध्याय व डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी प्रो.बलराज मधोक के आदर्शों व दर्शन को त्याग दिया है। और वर्तमान समय में आये बदलाव के कारण भाजपानीत सरकारों व उनकी शासन व्यवस्था में ‘भारतीयता’ दिखनी बन्द हो गयी है। इसीलिए भाजपा अब राजनीतिक पटरी से फिसलकर रसातल में पहुँच जाएगी।

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