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“इमाम शब्द की व्युत्पत्ति ‘अम्मा’ से है

Byadmin

Feb 20, 2021

“इमाम शब्द की व्युत्पत्ति ‘अम्मा’ से है जिसका अर्थ है हमसे पहले आने वाला, यानी हमारा नेता। मस्जिद में नमाज़ अदा करवाने वाला इमाम कहलाता है। घट घट वासी राम इमाम हैं, हिंद के संघी खच्चरों के अनुसार।

पाकिस्तान के जनक इक़बाल का शब्द इमामे हिंद जो उसने राम के लिये इस्तेमाल किया था। अब हमारी धार्मिक शब्दावली में घुसा दिया गया। यह भारत को धीरे धीरे ख़त्म करने का अभियान है। विमर्श देखिये! इमामे हिंद हो गया तो भारत ख़त्म। अब तो हिंद ही हिंद रहेगा।” (# Dileep Kumar Kaul)

मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम भारत के इमाम नहीं, भारत की आत्मा हैं। भारतीय चेतना, मर्यादा और परम्परा के मानबिन्दु हैं। भारत की भूमि के साथ जब श्रीराम का चरित्र समाविष्ट होता है, तब भारत राष्ट्र खड़ा होता है।

भारत के लिए राम ही राष्ट्र हैं और राष्ट्र ही राम है। श्रीराम धर्म के न उपदेशक हैं और न ही पैगम्बर हैं। वे साक्षात धर्म हैं “रामो विग्रहवान धर्म:।” श्रीराम और श्रीकृष्ण के बिना भारत की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

श्रीराम को इमाम-ए-हिन्द मानने वाले द्वि-राष्ट्र जनक अल्लामा इकबाल हिन्दुओं को गुमराही में डालकर भारत को विभाजित कर चले गए। यदि उन्होंने श्रीराम को वास्तव में भारत की अस्मिता का आधार माना होता तो कभी भी इस अस्मिता को खण्डित न करते।

इसके अलावा बट़वारे की स्थाई पृष्ठभूमि के लिए साम्प्रदायिक विचारधारा पर आधारित नज्में ‘शिकवा’ और ‘जवाब-ए-शिकवा’ लिखी, जो इस्लामी मजहबग्रंथों में प्रमुख स्थान रखती हैं।

उदाहरण – (नज्म – शिकवा, बन्द 7)
हम जो जीते थे जंगलों में मुसीबत के लिए,
और जो मरते थे तेरी नाम की अजमत के लिए;
थी न कुछ तेजगनी अपनी हकूमत के लिए,
सर वक़्फ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिए?
कौम अपनी जो जर-ओ-माल-ए-जहां पर मरती,
बुतफरोशी के एवेज बुतशिकनी क्यों करती?

मुसलमानों ने खुदा की अजमत (महानता) को फैलाने के लिए जंगलों की खाक छानी, तलवारबाजी की व जंग छेड़ी। न कि अपनी हकूमत स्थापित करने व दौलत इकट्ठा करने के लिए।
इकबाल, अल्लाह का नाम लेकर इस्लाम के हर नाजायज कृत्य को उचित और अल्लाह के नाम पर किया बता रहा है और अन्य धर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ने (बुत-शिकनी) को भी खुदा के नाम की अज़मत (महानता) के रास्ते में किया गया पवित्र कार्य बताता है।

बन्द – 8
टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे,
पांव शेरों के भी मैदां से उखड़ जाते थे,
तुम से सरकस हुआ कोई तो बिगड़ जाते थे,
तेग क्या चीज है हम तोप से लड़ जाते थे।
नक्श तौहीद का हर दिल पे बिठाया हमने,
जेर-ए-खंजर भी यह पैगाम सुनाया हमने।।

खुदा के विरुद्ध होने वालों से मुसलमान बिगाड़ जाते थे। खुदा से विरुद्ध होना यानी ‘तौहीद’ (ईश्वर एक को न मानना अर्थात इस्लामिक सिद्धांतों और मुहम्मद साहिब का न मानना) को न मानना। इसके लिए उन्होंने हर तरह से (बल प्रयोग द्वारा) कुरान को अन्यों पर लागू किया।

बन्द – 9
तूही कहदे कि उखाड़ा दरे खैबर किसने?
शहर कैसर का जो था किया सर किसने?
तोड़े मखलूम खुदा बंदों के पैकर किसने?
काट कर रख दिये कुफ्फार के लश्कर किसने?
किसने ठंडा किया आतिश कद-ए-ईरान को?
किसने फिर जिन्दा किया तजकर-ए-मजदान को?

ऐ खुदा बता कि खैबर का दर्रा किसने तोड़ा? और कैसर शहर को किसने जीता? यानी मुसलमानों ने जीता। खुदाई का दावा करने वालों की शख्सियत को किसने तोड़ा और काफिरों (गैर-मुस्लिम) की फौज को किसने काट डाला? (यानी मुसलमानों ने) ईरान के अग्नि पूजकों के हवन कुंड में पानी डालकर किसने उसे बुझा दिया यानी दूसरे धर्मावलंबियों के धार्मिक कार्यों और धर्मस्थलों को अपवित्र किया और किसने फिर खुदा के जिक्र को जिन्दा किया? (यानी मुसलमानों ने)

इस पद में इकबाल मुसलमान और काफिर (गैर-मुस्लिम के लिए हीन शब्द) का भेद पैदा करता है। यह बात बड़े गर्व के साथ बताई जा रही है कि काफिरों को मार कर और अन्य धर्मावलंबियों के धर्मस्थलों को अपवित्र करके उन्हें मृतप्राय कर ‘तजकर-ए-मजदान’ (अल्लाह के जिक्र) को पुनः जीवित किया है।

यह उनकी ‘प्रार्थना’ का स्वरूप है और अल्लाह को याद कराने का स्वरूप है। दूसरों के धर्मस्थलों को अपवित्र करना और गैर-मुस्लिमों को मार देना उनकी पहचान है।

‘शिकवा’ में मुसलमानों की जो पहचान उभरती है वह सिर्फ उसे मक्का-मदीना-मस्जिद से जुड़े होने की, कुरान और तौहीद को गले लगाने की, काफिर को कत्ल करने की, दूसरे के कामयाबियों पर जलने की, खुद मेहनत न करने की, अल्लाह के एकमात्र बंदे होने का दावा करने की, अपने आगे दूसरों को हेय समझने की, काफिर और मोमिन का भेद करने वाले उजड्डों की बनती है।

इससे मुसलमानों की कोई राष्ट्रीय पहचान नहीं बनती वरन एक आतंकवादी धार्मिक समूह (मिल्लत) की पहचान उभरती है, जो किसी भी राष्ट्र के एक कोने में हो सकता है। इसमें से कोई भी मौजूदा या चाहा गया लक्षण ऐसा नहीं है, जो किसी राष्ट्रीय पहचान के रूप में सामने आ सके।

उपरोक्त के आधार पर मुसलमान कोई राष्ट्रीय पहचान बनाने में कामयाब नहीं हुए हैं। सिवाय इसके कि उन्होंने थोड़ा बहुत कावे से जोड़ा जा सके और उनकी कुछ धार्मिक विशेषताएं बताई जा सके, जो विकृत रूप से किसी ऋणात्मक पहचान को अवश्य प्रकट करती है।

जहां तक भारत का प्रश्न है इकबाल द्वारा बताई गई और चाही गई मुसलमानों की विशेषताएं उनकी एक ऋणात्मक पहचान को अवश्य उभारती हैं और उन्हें एक झगड़ालू, धार्मिक रूप से असहिष्णु, उन्मादी तथा बे पढ़े-लिखे समूह के रूप में अवश्य प्रकट करती है।

सारे ‘शिकवा’ में इकबाल कहीं भी मुसलमानों को सहिष्णु और दूसरे धर्मों के प्रति भाईचारा दिखाने वाला नहीं बताता। कहीं भी अल्लाह से शांति, शुभ विचार और अपने राष्ट्र के लिए सुख-समृद्धि की कामना करने वाला नहीं बताता।

वह सिर्फ किसी मध्ययुगीन ‘हिजाजी’ (अरबी मुस्लिम) राजनीतिक उपलब्धियों या स्थितियों को मुसलमानों का आदर्श और इच्छा मानकर चलता है और यही इच्छा रखता है कि हिंदुस्तान में भी इस्लाम और इस्लामी राज्य आ जाए।

वैसे जिन लोगों को श्रीराम को इमाम-ए-हिन्द मानने वाला बताया जा रहा है। उन्हें देने के लिए श्रीकृष्ण जन्मभूमि और ज्ञानवापी सहित अगणित हिंदू मंदिरों के विनाश और उनकी जगह मस्जिदें व खानखाहें, मदरसे आदि बनाने का विस्तृत विवरण सीताराम गोयल ने अपनी पुस्तक “हिंदू टेम्पिल्स व्हाट हैपेंन्ड टू देम” (वॉइस ऑफ इंडिया, 1990-91) में उन मंदिरों के नाम, स्थान, जिला, प्रान्त सहित संक्षिप्त विवरण दिया है जो मुगल शासकों (1192-1707 एडी) ने ध्वस्त किए, को मुगलों से पूर्व की मंदिरों की स्थिति बहाल करके दे सकते हैं।

श्रीराम इमामे-ए-हिन्द नहीं, भारत की आत्मा हैं और वही रहेंगे, इमाम तो केवल उनका गुणगान ही कर सकते हैं।

किसी को खुश करने के लिए श्रीराम को कुछ भी नहीं मान सकते, श्रीराम जो हैं वही रहेंगे और उन्हें भी श्रीराम को भारतीय अस्मिता का प्रतीक मानना चाहिए। वे हमारी सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय चेतना के आधार स्तंभ हैं।

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