• Tue. Jun 28th, 2022

उधार के समोसे

Byadmin

May 3, 2021

उधार के समौसे


डी० एम० साहब की जिले में पहली नियुक्ति थी लेकिन साहब को चैन कहाँ? नियुक्ति के पहले ही दिन चल पड़े शहर के औचक निरीक्षण को। एक गरीब परिवार से निकलकर कलेक्टर तक का सफर तय करने में भी तो खूब चलना पड़ा था! गरीब की बचपन में शुरू हुई पदयात्रा आजीवन चलती ही रहती है, थकान और शिथिलता को तो मानो गरीब अपना बैरी बना बैठे हों- फर्क तो पड़ता है शहरी बाबूओं को।

हाँ तो साहब निकल पड़े अपने कारवें के साथ- पहला पड़ाव यूनिवर्सिटी रोड था। लंबी कतार में पुस्तकों, कपड़ों, बर्तनों आदि की दुकानें और कुछ छोटे-मोटे ढाबे और भाप उड़ाती चाय के स्टाल। अन्य तंग रास्तों को छोड़ दिया जाए तो मुख्य सड़क थोड़ी चौड़ी थी इसलिए कहीं-कहीं रिक्शे वालों का अल्पकालिक पार्किंग-स्थल का भी काम करती थी जहाँ वह थोड़ा-बहुत सुस्ता भी लेते थे- वैसे जेठ की दुपहरी में सुस्ताने के लिए जगह नहीं जिगरा चाहिए बाबू।

दरोगा साहेब को तुरंत कलेक्टर साहब के आने की भनक लग गई फिर क्या था सड़क को काफिले गुजरने लायक बनाने का काम युद्धस्तर पर शुरू हो गया- चौड़ीकरण से नहीं चौधरीकरण से!
‘चल भाई अंदर कर खोपचा’ एक हवलदार चिल्लाया। रिक्शे वालों के रिक्शे में लट्ठ प्रहार- चलो रे कहीं और लगाओ- “सुकून तो जैसे नसीब में है ही नहीं रिक्शे वालों के!”, ताई! तेणे सुण्या नहीं?- पीछे कर ये टोकरी। अब तक तो लोगों को पता चल ही गया होगा कि कोई बड़ा साहब रास्ते से जाएगा। अब चाय क्या-समोसा क्या, दोनों मूकदर्शक बन ग्राहकों के इंतजार में हैं, और उनको बनाने वाले इंतजार कर रहे हैं कि साहेब जाए फटाफट तो शुरू करें काम।

साहेब की एंट्री, गाड़ी के अंदर बैठा एक साधारण सी कद-काठी का आदमी यूनिवर्सिटी को जाने वाले साईकल पथ की ओर इशारा करता है। ड्राइवर गाड़ी रोकता है और साहिब जैसा दिखने वाला स्तब्ध सा व्यक्ति बाहर निकलकर इधर-उधर निहारता है- कदम एक बुकशॉप की ओर बढ़ते हैं, इधर तो बहुत भीड़-भाड़ हुआ करती थी।
किताब बेचने वाला- बस साहब ऐसे ही है यहाँ, गर्मी बहुत है इसलिए कम लोग हैं।
साहब मन ही मन सोच रहे थे- तेज गर्मी में ही तो गरीब अपना सामान बेचने निकलता है।
साहब बात लोगों से कर रहे हैं पर उनकी आंखें नुक्कड़ के कोनों पर नजरें दौड़ा रही हैं। मानो कुछ कीमती चीज खो गयी हो। सहसा बिजली की रफ्तार से एक ओर चल पड़ते हैं। जमीन पर एक कढ़ाई, एक तेल की बोतल और कुछ गुँथा हुआ मैदा व अन्य सामान ढक कर रखा हुआ है।

दरोगा साहेब गुस्से से अपने हवलदारों की ओर देखते हुए- तुमने बोला था सब हटा दिया यहां से? हैं!!!
हवलदार- साहब से दूरी बनाकर आजू-बाजू देखता हुआ- किसका है रे ये।
इतनी देर में एक वृद्ध हाथ जोड़कर विनती करने की मुद्रा में सामान उठाने लगता है- साहब गलती हो गयी, अभी हटाये देता हूँ।
तभी एक भावुक आवाज वृद्ध के कर्णपटल पर पड़ती है।-“काका”
वृद्ध सोचता है- मुझे तो शहर में जो भी मिलता है ‘चचा’ बोलता है काका तो !!!!!
कम्पित शरीर और पथरायी आँखें भीड़ में उस आवाज को ढूंढने लगती हैं।
“काका मैं हूँ।”- भूल गए, उधार के समौसे?
स्तब्ध वृद्ध क्षणभर के लिए उसे ‘काका’ पुकारने वाले उस शख्स के अतीत में अश्रुधारा के साथ डूबने लगता है। – कैसे एक बिना माँ का गरीब बच्चा गाँव से अनजाने शहर में पढ़ने आया था। कोई भी तो नहीं था यहाँ उसका- सिवा अपने जैसे कुछ गरीब लोगों के। काका भी उन्हीं में से एक थे। लेकिन हर शाम ‘काका’ के समौसे की दुकान पर आने वाला वह गरीब अपनी पढ़ाई पूरी कर शहर छोड़ने के बाद वापस लौट कर फिर यहीं आएगा यह काका को भी पता न था- प्यार से बोला करता था-“काका अभी उधार खिला रहे हो, देख लेना एक दिन सूत समेत लौटाऊंगा।”
अब ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो आज मूलधन ब्याज सहित सम्मुख खड़ा है। भावनारूपी मूलधन में ‘काका’ को चक्रवृद्धि ब्याज जो मिलने वाला था।

जहाँ एक तरफ ‘काका’ शब्द सुनाई दिया वहीं साहब और वृद्ध दोनों को एक-दूसरे को पहचानने में तनिक भी देर न लगी। साहब तुरंत काका से लिपट पड़े। साहब की निगाहें अपनी मूल्यावान वस्तु को ढूंढने में कामयाब हो गई।
समौसे तो बहाना था- एक ऐसा बहाना जिसने दोनों को अनजान शहर में एक-दूसरे से जोड़े रखा, गरीब को गरीब ही जानता है और भावनाओं का एक संबल चाय-समौसे की दुकान पर मिलता है।
स्तब्ध मशीनीकृत समाज और स्थानिक प्रशासनिक मशीनरी को पीछे छोड़ साहेब का कारवाँ ‘काका’ को साथ लेकर आगे बढ़ गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

AllEscort