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कितने दोहरे नियम है समाज मे पुरुष और स्त्री के बीच?

Byadmin

Feb 20, 2021

वासना की नजर किसी को पसन्द नही आती ।कोई नही चाहता कि मेरा उपयोग कोई साधन की तरह करे ।
कोई स्त्री नही चाहती कि कोई पुरुष केवल उसके स्त्री होने के नाते उसके समीप आए ।कोई स्त्री ये पसन्द नही करती की पुरुष केवल अपनी वासना पूर्ति के लिए स्त्री के शरीर का उपयोग करे ।
हर स्त्री के हृदय में ये भाव होते हैं कि पुरूष एक दोस्त की तरह उसके पास आए ।हर पुरुष उसे एक दोस्त की तरह देखे ।एक इंसान की तरह एक जीवन की तरह देखे ।
न कि केवल योनि और स्तन देखकर उसकी तरफ आकर्षित हो ।शरीर को देखकर किसी के पास जाना हिंसा है अपराध है और सबसे बड़ी बात मनुष्य के होने का अपमान है ।क्योंकि मनुष्य केवल शरीर ही नही है ।
मनुष्य की चेतना का विस्तार शरीर से परे है ।
मनुष्य की चेतना परमात्मा होने को है ।और शरीर का बोध बहुत नीचे की अवस्था है ।शरीर मे तो जानवर भी जी लेते हैं।
इसलिए जब भी कोई पुरुष स्त्री के पास वासना पूर्ति की नजर से जाता है तो स्त्री भांप लेती है और अपने कदम पीछे ले लेती है ।
और पुरुष में सबसे गन्दी आदत होती है पति बनने की अर्थात स्वामी बनने की अर्थात हर जगह अपना वर्चस्व स्थापित करने की ।
बस पुरुष के इन्ही गुणों के कारण बहुत सारी स्त्रियां जिन्हें अपने होने का थोड़ा बहुत आभास होता है वो तुरन्त पीछे हट जाती हैं।
क्योंकि कोई भी स्त्री अपना शोषण नही करवाना चाहेगी ।कोई भी ऐसी स्त्री जिसके भीतर स्वाभिमान हो , जिसे आभास हो कि वो सम्पूर्ण अस्तित्व लिए है अपने भीतर कभी राजी नही होगी पुरुष के नजदीक जाने को ।
घर मे पड़े फर्नीचर में और एक जीवित स्त्री मव फर्क होता है ।निर्जीव चीजों का प्रयोग मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए अपनी सुविधाओं के लिए करता है लेकिन किसी जीवित मनुष्य का उपयोग अपने अहंकार को पोषित करने के लिए करना पाप है हिंसा है ।
हम विवाह इसलिए रचाते हैं कि पुरुष का वंश बढ़े उसका नाम हो समाज मे ।मौत के बाद भी उसका नाम लेने वाला कोई हो ।बस स्त्री का इतना ही उपयोग होता है सामाजिक रीति रिवाजों में की वो पुरुष का वंश बढा दे ।
हमारे घरों में अक्सर कहा जाता है कि (बस अब मुझसे काम नही होता बेटा जा बहु ले आ ।)
ये शब्द मुझे तीर की तरह चुभते थे कि क्या औरत केवल काम करने के लिए लाई जाती हैं घरो में शादी करके ?
बहुत सारे पुरुष दोस्त है मेरे ।और जब उनसे पूछती हूँ कि किसलिए तुम्हे स्त्री चाहिए जीवन मे? तो उनका जवाब कुछ इस तरह होता है कि — मेरे मा बाप की सेवा कर दे ,मुझे समय से खाना दे दे , मेरा वंश बढा दे और रात को ——–?
अक्सर सोचती रहती हूं कि क्या स्त्री का यही उपयोग है हमारे समाज मे ?
क्या कभी समाज उसे एक जीवित इंसान के रूप में नही अपनाएगा?
क्या कभी एक साथी की तरह पुरुष सजा हाथ नही पकड़ सकता?
क्या स्त्री का उपयोग मशीन से ज्यादा नही समझ सकता समाज ?
बहुत बात न्यूज़ में देखती हूँ कि बहुत सारी जगह आज भी ऐसी है जहां जब पुरुष की पार न बसाए स्त्री पे तो उसे ये कहकर वस्त्र हीन कर देता है समाज की ये पिशाचिनी है ,ये समाज के लिए हानिकारक है ।
इतनी कुंठा और हींन भावना से भरा हुआ जीता है पुरुष की जब स्त्री को वो न झुका सके अपने निचे तब वो स्त्री के चरित्र पर सवाल खड़े कर देता है कि ये कुलटा है ये चरित्रहीन है वगेरह ।
स्त्री का चरित्र तब तक ही होता है समाज मे जब तक वो पुरुष की बात सुनती रहे नीचे गर्दन करके ।और जिस दिन ओरत विद्रोह कर दे उसी दिन सारे समाज मे वो रंडी, वेश्या ,पागल और ऐसे बहुत सारे नामो से नवाजी जाती है ।
स्त्री भी पुरुष की तरह एक स्वतंत्र जीवन है उसके भीतर भी सपने है इच्छाओं का सैलाब है वो भी खुले आसमान में उड़ना चाहती है वो भी अपनी मर्जी से जीवन जीना चाहती है वो भी अपने अस्तित्व को जानना पहचानना और जीना चाहती है ।
स्त्री का जन्म केवल समाज की आकांक्षाओं को पूरा करने को नही हुआ कि तुम्हारे सड़े गले रीति रिवाज और नियमों का पालन करती रहे वो और अपनी इच्छाओं का गला घोंटती रहे हर पल ।उसे भी जीने का उतना ही अधिकार है जितना पुरुष को ।
लेकिन कभी फुर्सत के पल मिले तो बैठकर सोचना की कितने दोहरे नियम है समाज मे पुरुष और स्त्री के बीच???????

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