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ग्लानिभर्वति भारत

Byadmin

Nov 20, 2021

:-: ग्लानिभर्वति भारत :-:
गीताजी के 4 अध्याय के 7वें व 8वें लोकप्रिय श्लोक में “” ग्लानिभर्वति भारत “” आता हैं,वह
भारत शब्द भा और रत दो शब्दों से मिलकर बना हुआ हैं।भा के दो अर्थ हैं भार और ज्ञान तथा रत का अर्थ है लगा हुआ ,जो ईकाई निरंतर सबका भार उठाने में लगी हुई हैं,वह भारत हैं यानि पृथ्वी और जिस भूमि पर लोग ज्ञान की खोज में निरंतर लगें हुए हैं, वह भी भारत हैं अर्थात भारत देश।भारत ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित हैं।इस निरंतर भार उठाने वाली पृथ्वी के जिस स्थान पर ,निरंतर ज्ञान की खोज में जीव लगें हुए हैं ,जब ऐसी पृथ्वी यानि भारत में तामसिक गुणों के दुष्प्रभाव के कारण अज्ञानता का प्रभाव बढ़ने से ,यह पृथ्वी उस अज्ञानता की चपेट में आने के कारण ,अपने मूल प्राकृतिक स्वरूप को खोकर,भौतिक स्वरूप में ढल जाती हैं, तब तब ज्ञान और धर्म की वृद्धि करने के लिए भगवान अवतार लेते हैं।तामसिक गुणों का प्रतिनिधित्व श्रीविष्णु करतें हैं, इसलिए तामसिक दुष्प्रभावों को नष्ट और नियंत्रित करने के लिए,विष्णु जी को ही अवतार लेना पड़ता हैं।यहाँ धर्म का अर्थ हैं कि जिसनें जिस कार्य को धारण किया हुआ हैं, वह उस कार्य को न करके,किसी और कार्य को करने लगता हैं, तो अधर्म बढ़ जाता हैं जैसे नेताओं ने समाजसेवा के कार्य को धारण किया हैं, लेकिन वह समाजसेवा के अलावा सब कार्य करते हैं।वर्तमान में भी भारत अर्थात पृथ्वी पर धर्म का लोप हो जाने के कारण,धर्म की पुर्नस्थापना का समय निकट हैं क्योंकि विजय सत्य की ही होगी।

धन्यवाद :- बदला नहीं बदलाव चाहिए

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