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चिंता और शोक से मुक्ति के लिए गीता के कुछ सिद्ध मंत्र!!

Byadmin

Feb 24, 2022

चिंता और शोक से मुक्ति के लिए गीता के कुछ सिद्ध मंत्र!!!!!!!!!

जिस प्रकार कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली गीता ने अर्जुन को कर्त्तव्य-अकर्तव्य के भ्रमजाल से निकालकर एक नयी दृष्टि दी, उसी तरह पता नहीं, कितनी पीढ़ियों ने जीवन के अपने छोटे-बड़े संग्राम में, संशय के क्षणों में, चिन्ताओं के भंवर से निकलने में गीता-पाठ से हिम्मत से खड़े रहने की शक्ति प्राप्त की है । गीता मनुष्य को सुखी रहना सिखाती है । भगवान में विश्वास रखने वालों के लिए गीता माता के समान है जो निराशा के गर्त में डूबे लोगों को आशा की किरण दिखाती है ।

जानते हैं-जीवन-संग्राम में चिंताओं से हारे-थके मनुष्य को हिम्मत से खड़े रहने की शक्ति देने वाले गीता के कुछ अंश-

चिंता, शोक और उद्वेग से मुक्ति के लिए गीता के कुछ सिद्ध मंत्र

आज के युग की सबसे बड़ी बीमारी चिन्ता का समाधान बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

▪️जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है ।

जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा । भूत का पश्चाताप न करो । भविष्य की चिन्ता न करो । वर्तमान में जियो ।

▪️यह संसार एक रंगमंच है । जहां सभी को खेलना (अपना कर्त्तव्य कर्म करना) है । खेल की चीजों को ‘अपना’ मान लेने से ही अशांति आ जाती है । अपनापन छोड़ा और शांति मिली । (२।७१)

▪️तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो ? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया ? तुमने क्या पैदा किया, जो नाश हो गया । न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं (भगवान) से लिया, जो दिया यहीं पर दिया । खाली हाथ आए, खाली हाथ चले जाओगे । फिर भी मनुष्य वस्तुओं और प्राणियों में ‘मैं’ और ‘मेरेपन’ का भाव रखता है । मनुष्य सभी को अपने मन-मुताबिक नहीं बना सकता, जितने दिन चाहें साथ में रह नहीं सकता, न किसी का स्वभाव बदल सकता है और न ही रंग-रूप । तब ये सब ‘मेरे’ और ‘मेरी चीजें’ कैसे उसकी हुईं ?

▪️जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा । तुम इसे अपना समझकर प्रसन्न हो रहे हो । बस यही प्रसन्नता ही तुम्हारे दु:खों का कारण है । अत: मनुष्य को मानना चाहिए कि ये संसार, घर, धन, परिवार सब भगवान का है और हम भगवान का ही काम करते हैं । सब चीजें भगवान की मानने से वे प्रसाद-रूप हो जाएंगी । ऐसा भाव रहने से चिन्ता, भय आदि कुछ नहीं रहेगा ।

▪️अपने आपको भगवान के अर्पित करो । यह सबसे उत्तम सहारा है । जो इस सहारे को जानता है, वह भय, चिन्ता और शोक से सदैव मुक्त है ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।। (१८।६६)

अर्थात्-‘तू सम्पूर्ण धर्मों के आश्रयों को छोड़कर केवल एक मेरी शरण में आ जा । मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, तू चिन्ता मत कर ।’

भगवान की शरण में जाने का अर्थ!है-श्रद्धा-पूर्वक निष्कामभाव से भगवान की आज्ञा का पालन करना, उनके गुण व स्वरूप का चिन्तन करना एवं हमारे कर्मों के अनुसार जो सुख-दु:ख आदि प्राप्त हों उनमें सम रहना।

▪️हर परिस्थिति में प्रसन्न, संतोषी और सहनशील बने रहना-संसार में सुख भी आता है और दु:ख भी; क्योंकि सुख-दु:ख, अनुकूलता-प्रतिकूलता संसार का स्वरूप है । भगवान का कहना है कि सुख-दु:ख तो आने-जाने वाले और अनित्य हैं । उनको तुम सहन करो । जिसका मन सम भाव में स्थित है, उन्होंने जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया; क्योंकि समता आने से सब दोष चले जाते हैं ।

▪️गीता कहती है कि ये दो तरह-तरह की परिस्थितियां आ रही हैं, उनके साथ मिलो मत, उनमें प्रसन्न-अप्रसन्न मत होओ; वरन् उनका सदुपयोग करो । हमें मिलने वाली वस्तु, परिस्थिति आदि दूसरे व्यक्ति के अधीन नहीं है वरन् प्रारब्ध के अधीन है । प्रारब्ध के अनुसार जो वस्तु, परिस्थिति हमें मिलने वाली है, वह न चाहने पर भी मिलेगी । प्रतिकूल परिस्थिति भी अपने-आप आती है, उसी प्रकार अनुकूल परिस्थिति भी अपने-आप आएगी । इसलिए मनुष्य को केवल निष्कामभाव से अपना कर्त्तव्य करना चाहिए ।

प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर ।
तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्रीरघुबीर ।।

गीता में भगवान ने मनुष्य को चिंतामुक्त रहने के लिए कितना सारे आश्वासन दिये हैं-

▪️’तू मेरे परायण होकर संपूर्ण कर्मों को मेरे अर्पण कर दे तो तू मेरी कृपा से संपूर्ण विघ्न-बाधाओं को तर जाएगा ।’ (१८।५७-५८)

▪️’मेरे परायण हुए जो भक्त संपूर्ण कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्यभाव से मेरा भजन करते हैं, उनका मैं स्वयं संसार-सागर से उद्धार करने वाला बन जाता हूँ ।’

▪️’मुझे भज कर लोग स्वर्ग तक की कामना करते हैं; मैं उन्हें देता हूँ । अर्थात् सब कुछ परमात्मा से सुलभ है ।’ (९।२०)

गीता चिन्ताग्रस्त मनुष्य को हर समय भगवान के भरोसे प्रसन्न रहने के लिए कहती है-‘तू केवल मेरी ही शरण में आ जा । मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर ।’

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ।। (१८.६२)

भगवान ही शान्ति का आगार है और कोई नहीं, उन्हीं के शरण में जाने से ही परम शान्ति मिलती है, मिल सकती है, धन-वैभव से शान्ति नहीं मिल सकती । विद्या से भी शान्ति नहीं मिलती । वह तो उनकी शरण में जाने से ही मिलेगी ।

चिन्ता दीनदयाल को मो मन सदा अनन्द।
जायो सो प्रतिपालिहै रामदास गोविन्द ।।भगवान श्रीकृष्ण का गोप-गोपियों को वैकुण्ठ का दर्शन कराना!!!!!!

भगवान के सभी नाम श्रेष्ठ हैं, सभी धाम पवित्र हैं, सभी स्वरूप ध्येय (ध्यान करने के लिए) हैं; फिर भी जो माधुर्य ब्रज-वृंदावन में है, वह वैकुण्ठ में नहीं है । माधुर्य की अधिकता के कारण ही ब्रज को वैकुण्ठ से श्रेष्ठ माना गया है।

इससे सम्बधित एक लीला श्रीमद्भागवत और श्रीगर्ग संहिता में पढ़ने को मिलती है—
एक बार नन्दबाबा ने एकादशी का व्रत किया और उसी दिन रात में द्वादशी लगने पर वह मध्य रात्रि में ही ग्वालों के साथ यमुना-स्नान के लिए चले गए । नन्दबाबा को ज्ञात नहीं था कि यह असुरों की बेला है, इस समय स्नान के लिए यमुनाजल में प्रवेश नहीं करना चाहिए । (रात को दस बजे से प्रात: साढ़े तीन बजे तक स्नान का निषेध है ।)

जल के देवता वरुण का एक सेवक उनको पकड़ कर वरुण लोक में ले गया । नन्दबाबा को डूबा हुआ जान कर ग्वाल-बालों में कोहराम मच गया । सभी कहने लगे—‘कृष्ण ! तुम्हारा ही भरोसा है, तुम्हीं अपने पिता को वापिस ला सकते हो । सदा से ही तुमने हमारे सारे भय दूर किए हैं ।’

श्रीकृष्ण जानते थे कि ये वरुण के सेवक की लीला है । वे सबको सांत्वना देकर वरुण लोक गए । वहां उन्होंने वरुणपुरी के विशाल दुर्ग को जाते ही भस्म कर दिया । भगवान श्रीकृष्ण को कुपित देख कर लोकपाल वरुण उनकी स्तुति करते हुए बोले—

नम: श्रीकृष्णचन्द्राय परिपूर्णतमाय च ।
असंख्यब्रह्माण्डभृते गोलोकपतये नम: ।।
चतुर्व्यूहाय महसे नमस्ते सर्वतेजसे ।
नमस्ते सर्वभावाय परस्मै ब्रह्मणे नम: ।।

अर्थात्—श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार है । परिपूर्णतम परमात्मा तथा असंख्य ब्रह्माण्डों का भरण-पोषण करने वाले गोलोकपति को नमस्कार है । चतुर्व्यूह के रूप में प्रकट तेजोमय श्रीहरि को नमस्कार है । सर्वतेज:स्वरूप आप परमेश्वर को नमस्कार है। सर्वस्वरूप आप परब्रह्म परमात्मा को नमस्कार है ।

वरुण देव ने कहा—‘मेरे किसी मूर्ख सेवक ने यह पहली बार आपकी गलती की है; उसके लिए आप मुझे क्षमा करें । मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए ।’

लोकपाल वरुण की स्तुति सुनकर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए और नन्दबाबा को जीवित लेकर ब्रजमण्डल में लौट आए ।

नन्दबाबा ने वरुण लोक में देखा कि कैसे लोकपाल वरुण उनके पुत्र श्रीकृष्ण के चरणों में झुक-झुक कर प्रणाम कर रहे थे, उन्हें बड़ा विस्मय हुआ । अब नन्दबाबा गोप-गोपियों और अपने जाति-भाइयों को वरुण लोक में श्रीकृष्ण के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहते—‘मैं वरुण लोक गया था, वहां वरुण देव ने कृष्ण को साक्षात् भगवान बताया । यह हमारा लाला नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान है ।’

गोप-गोपियों ने जब यह सब सुना तो उनके मन में भी उत्सुकता जगी कि क्या भगवान श्रीकृष्ण हम लोगों को भी अपना वह मायातीत स्वधाम दिखलायेंगे ? वे श्रीकृष्ण के पीछे पड़ गए कि—‘कन्हैया ! तुम यदि लोकपालों से पूजित साक्षात् भगवान हो तो हमें भी वैकुण्ठ लोक का दर्शन कराओ ।’

जिस जलाशय में भगवान श्रीकृष्ण ने अक्रूर को अपना स्वरूप दिखलाया था, उसी ब्रह्मह्रद में भगवान उन गोप-गोपियों को ले गए । वहां उन लोगों ने उसमें डुबकी लगाई । श्रीकृष्ण ने कहा—‘अच्छा, तुम सब अब आंखें बंद करो ।’

अगले ही पल जैसे ही सबने अपनी आंखें खोलीं तो सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म लिए वनमाला से सुशोभित, असंख्य सूर्यों के समान तेजस्वी श्रीकृष्ण शेषनाग की शय्या पर पौढ़े थे । ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवा कर रहे थे । यह देखकर सीधे-सादे गोप-गोपियां आपस में कानाफूसी करने लगे—‘अरे, ये देखने में तो अपने कन्हैया से लगते हैं पर इनके चार हाथ हैं । हमारे कन्हैया के पास तो शंख, चक्र, गदा, पद्म हैं नहीं, वह तो बांसुरी वाला है । हम सब उसके समीप ही खड़े हैं, तो भी हमें नीचे खड़ा करके यह ऊंचे सिंहासन पर बैठ गया और हमसे एक क्षण के लिए बात तक नहीं करता।’

वैकुण्ठ में ब्रज की तरह प्रेम की नहीं मर्यादा की प्रधानता है । गोप-गोपियों को इस तरह कानाफूसी करते देख कर भगवान के गदाधारी पार्षदों ने उनको डांटते हुए कहा—‘अरे, वनचरो ! चुप हो जाओ । यहां भाषण न करो । क्या तुमने कभी श्रीहरि की सभा नहीं देखी है ? यहां सबके परमात्मा देवाधिदेव भगवान श्रीहरि विराजमान हैं और वेद उनके गुण गाते हैं ।’

गोप-गोपियां तो गंवार ठहरे, आपस में कहने लगे—‘यहां तो बोलने की भी मनाही है, कन्हैया के पास भी ये पार्षद जाने नहीं देंगे । अरे भैया, हम को वैकुण्ठ में आकर बहुत पछताए । यहां तो कन्हैया चार हाथों वाला हो गया है, और हमसे बहुत दूर बैठा है, हम उसके पास जा भी नहीं सकते हैं । ब्रज से बढ़कर कोई दूसरा सुखदायक और श्रेष्ठ लोक नहीं है; क्योंकि ब्रज में तो कन्हैया हमारा सखा है, हमारे साथ गेंद खेलता, घोड़ा बनता । यहां तो आफत ही आ गई, खड़े रहना भी मुश्किल है । वैकुण्ठ में आकर तो हम सच में बहुत पछता रहे हैं ।’

भगवान तो अंतर्यामी हैं । जब चतुर्भुज रूप श्रीकृष्ण ने देखा कि गोप-गोपियां दु:खी हो रहे हैं तो वे तुरंत उनके साथ ब्रज लौट आए ।

ब्रज में आकर गोप-गोपियों ने भी चैन की सांस लेते हुए कहा—वैकुण्ठ में जाकर हम क्या करेंगे ? वहां यमुना, गिरि गोवर्धन, वंशीवट, निकुंज, वृंदावन, नन्दबाबा-यशोदा और उनकी गायें—कुछ भी तो नहीं हैं । वहां ब्रज की मंद सुगंधित बयार भी नहीं बहती, न ही मोर-हंस कूजते हैं । वहां कन्हैया की वंशीधुन भी नहीं सुनाई देती । ब्रज और नन्दबाबा के पुत्र को छोड़कर हमारी बला ही वैकुण्ठ में बसे ।

कहा करौं वैकुण्ठहि जाय ।
जहां नहिं वंशीवट यमुना गिरिगोवर्धन नन्द की गाय ।।

जहाँ नहिं यह कुंज लताद्रुम मंद सुगंध बहत नहिं वाय ।
कोकिल हंस मोर नहीं कूजत ताको बसिवो काहि सुहाय ।।

जहाँ नहिं धुन वंशी की बाजत कृष्ण न पुरवत अधर लगाय ।
प्रेम पुलक रोमांच न उपजत मन वच क्रम आवत नहिं धाय ।।

जहाँ नहिं यह भूमि वृंदावन बाबा नन्द यशोमति माय ।
‘गोविन्द’ प्रभु तजि नन्द सुवन को ब्रज तजि वहाँ मेरी बसै बलाय ।।

वाह रे व्रज के भाग्य ! धन्य है व्रज, जिसने परमात्मा श्रीकृष्ण का सांनिध्य पाया, उसकी महत्ता का वर्णन कौन कर सकता है ? ऐसा सुख व्रजवासियों के अलावा अन्य किसी देवता को नसीब नहीं है । सभी व्रजवासियों के प्रेम के केन्द्र श्रीकृष्ण थे और भगवान श्रीकृष्ण का भी जीवन, कार्य और लीलाएं अपने प्यारे व्रजवासियों को सुखी और कृतार्थ करने के लिए थीं । भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है–

ब्रजवासी बल्लभ सदा मेरे जीवन प्रान ।
इन्हें न कबहूँ बिसारिहौं मोहि नंदबाबा की आन ।।

सारा संसार जिसे ‘अविनाशी परब्रह्म’ कहता है, वह इस व्रज के घर-घर का खिलौना है । यह व्रज तो तीनों लोक से न्यारा है जिसके हाथ में श्रीकृष्णरूपी सुख की राशि लग गयी है–

जो सुख लेत सदा ब्रजवासी ।
सो सुख सपने हू नहिं पावत, जे जन हैं बैकुंठ-निवासी ।।

ह्याँ घर घर ह्वै रह्यौ खिलौना, जगत कहत जाको अविनासी ।
नागरिदास विस्व तें न्यारी, लगि गई हाथ लूट सुखरासी ।।भगवान विष्णु का पाषाणरूप है शालग्राम!!!!!!!

जहां शालग्राम शिला रहती है वहां भगवान श्रीहरि व लक्ष्मीजी के साथ सभी तीर्थ निवास करते हैं!

हिमालय पर्वत के मध्यभाग में शालग्राम-पर्वत (मुक्तिनाथ) है, यहां भगवान विष्णु के गण्डस्थल से गण्डकी नदी निकलती है, वहां से निकलने वाले पत्थर को शालग्राम कहते हैं । वहां रहने वाले कीड़े अपने तीखे दांतों से शिला को काट-काट कर उसमें चक्र, वनमाला, गाय के खुर आदि का चिह्न बना देते हैं । भगवान विष्णु सर्वव्यापक होने पर भी शालग्राम शिला में साक्षात रूप से रहते हैं जैसे काठ में अग्नि गुप्त रूप से रहती है; इसीलिए इनकी प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है और पूजा में भी आवाहन और विसर्जन नहीं किया जाता है ।

शालग्राम शिला में भगवान की उपस्थिति का सबसे सुन्दर उदाहरण वृन्दावनधाम में श्रीराधारमणजी हैं जो शालग्राम शिला से ही प्रकट हुए हैं । इसकी कथा इस प्रकार है–

एक बार श्रीगोपालभट्टजी गण्डकी नदी में स्नान कर रहे थे, तो सूर्य को अर्घ्य देते समय एक अद्भुत शालग्राम शिला उनकी अंजुली में आ गयी जिसे वे वृन्दावन लाकर पूजा-अर्चना करने लगे । एक दिन एक सेठ ने वृंदावन में भगवान के सभी विग्रहों के लिए सुन्दर वस्त्र-आभूषण बांटे । श्रीगोपालभट्टजी को भी वस्त्र-आभूषण मिले परन्तु वे उन्हें शालग्राम को कैसे धारण कराते ? भट्टजी के मन में भाव आया कि अगर मेरे आराध्य के भी अन्य विग्रहों की तरह हस्त और पाद होते तो मैं भी उन्हें सजाता । यह विचार करते हुए उन्हें सारी रात नींद नहीं आयी । प्रात:काल जब वे उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा क्योंकि उनके शालग्राम द्वादश अंगुल के ललित त्रिभंगी दो भुजाओं वाले मुस्कराते हुए श्रीराधारमनजी बन गए थे । इस प्रसंग के लिए इससे ज्यादा सुन्दर उदाहरण और कोई हो नहीं सकता ।

शालग्राम और तुलसी : – छलपूर्वक तुलसी का पातिव्रत-भंग करने के कारण भगवान श्रीहरि को शाप देते हुए तुलसी ने कहा कि आपका हृदय पाषाण के समान है; अत: अब मेरे शाप से आप पाषाणरूप होकर पृथ्वी पर रहें । भगवान विष्णु पतिव्रता तुलसी (वृन्दा) के शाप से शालग्राम शिला बन गए । वृन्दा भी तुलसी के रूप में परिवर्तित हो गयीं । शालग्रामजी पर से केवल शयन कराते समय ही तुलसी हटाकर बगल में रख दी जाती है, इसके अलावा वे कभी तुलसी से अलग नहीं होते हैं । जो शालग्राम पर से तुलसीपत्र को हटा देता है, वह दूसरे जन्म में पत्नी विहीन होता है ।

सुख-समृद्धि और मोक्ष देने वाली विभिन्न प्रकार की शालग्राम शिलाएं,आकृति में विभिन्नता से शालग्राम शिला अनेक प्रकार की होती हैं—

—जिसमें एक द्वारका चिह्न, चार चक्र और वनमाला हो व श्यामवर्ण का हो वह शिला ’लक्ष्मीनारायण’ का रूप होती है ।

एक द्वार, चार चक्र व श्याम वर्ण की शिला ‘लक्ष्मीजनार्दन’कहलाती है ।

दो द्वार, चार चक्र और गाय के खुर का चिह्न वाली शिला ‘राघवेन्द्र’का रूप होती है ।

जिसमें दो बहुत छोटे चक्र चिह्न व श्यामवर्ण की हो वह ‘दधिवामन’ कहलाती है। गृहस्थों के लिए इसकी पूजा अत्यन्त शुभदायक है ।

अत्यन्त छोटे दो चक्र व वनमाला का चिह्न वाली शिला ‘श्रीधर’भगवान का रूप है । इसकी पूजा से गृहस्थ श्रीसम्पन्न हो जाते हैं ।

जो शिला मोटी, पूरी गोल व दो बहुत छोटे चक्र वाली हो, वह ‘दामोदर’ के नाम से जानी जाती है ।

जो शिला वर्तुलाकार, दो चक्र, तरकस और बाण के चिह्न से सुशोभित हो वह ‘रणराम’ के नाम से जानी जाती है ।

जिस शिला पर सात चक्र, छत्र व तरकस हो वह भगवान ‘राजराजेश्वर’ का विग्रह मानी जाती है । इसकी उपासना से मनुष्य को राजा जैसी सम्पत्ति प्राप्त होती है ।

चौदह चक्रों, मेघश्याम रंग की मोटी शिला को भगवान ‘अनन्त’कहते हैं । इसके पूजन से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फल प्राप्त होते हैं ।

एक चक्र वाली शिला ‘सुदर्शन’, दो चक्र और गो खुर वाली ‘मधुसूदन’, दो चक्र और घोड़े के मुख की आकृति वाली ‘हयग्रीव’, और दो चक्र और विकट रूप वाली शिला ‘नरसिंह’ कहलाती है । इसकी पूजा से मनुष्य को वैराग्य हो जाता है।

जिसमें द्वार-देश में दो चक्र और श्री का चिह्न हो वह ‘वासुदेव’, जिसमें बहुत से छोटे छिद्र हों वह ‘प्रद्युम्न’, जिसमें दो सटे हुए चक्र हों वह ‘संकर्षण’ और जो गोलाकार पीले रंग की हो वह ‘अनिरुद्ध’कहलाती है।

कैसे करें भगवान शालग्राम का अभिषेक?????

एक तांबे की कटोरी या प्लेट में तुलसी रखकर उस पर शालग्राम को रख दें । फिर शंख में जल भरकर घण्टी बजाते हुए श्रीविष्णवे नम: या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या ॐ नमो नारायणाय, यापुरुषसूक्त के मन्त्रों का पाठ करते हुए भगवान शालग्राम का अभिषेक किया जाता है । यदि स्नान कराने वाले जल में इत्र व सफेद चन्दन मिला लें तो यह और भी उत्तम है । शालग्राम शिला के स्नान का जल ‘शालग्राम-सिलोदक’ या ‘अष्टांग’ कहलाता है।

शालग्राम-सिलोदक (स्नान के जल) को यदि श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाए तो मनुष्य को कोई रोग नहीं होता है, व जन्म, मृत्यु और जरा से छुटकारा मिल जाता है ।

शालग्राम-सिलोदक के पीने से अकालमृत्यु और अपमृत्यु का भी नाश हो जाता है।

शालग्राम-सिलोदक को अपने ऊपर छिड़कने से तीर्थ में स्नान का फल प्राप्त होता है ।

मरणासन्न व्यक्ति के मुख में यदि शालग्राम का जल डाल दिया जाए को वह भगवान श्रीहरि के चरणों में लीन हो जाता है ।

इस जल को पीने से मनष्य के सभी पाप दूर हो जाते हैं व पुनर्जन्म नहीं होता है।

भगवान शालग्राम के पूजन में रखेँ निम्न बातों का ध्यान

शालग्रामजी की पूजा स्त्री को नहीं करनी चाहिए। वह अपने प्रतिनिधि के रूप में ब्राह्मण या परिवार के पुरुष सदस्य से शालग्रामजी की पूजा करवा सकती है ।

—शालग्राम सदैव सम संख्या में ही पूजे जाते है किन्तु दो शालग्राम की पूजा नहीं की जाती है । विषम संख्या में पूजा नहीं करने पर भी एक शालग्रामजी की पूजा का विधान है ।

शालग्राम पूजन से मिलते हैं ये चमत्कारी लाभ

ये सभी शालग्राम शिलाएं सुख देने वाली हैं क्योंकि जहां शालग्राम शिला रहती है वहां भगवान श्रीहरि व लक्ष्मीजी के साथ सभी तीर्थ सदैव निवास करते हैं । मनुष्य के बहुत से जन्मों के पुण्यों से यदि कभी गोष्पद (गाय के खुर) चिह्न से युक्त श्रीकृष्ण-शिला प्राप्त हो जाए तो उसके पूजन से पुनर्जन्म नहीं होता है । इस शिला की पहले परीक्षा कर लेनी चाहिए—

यदि यह काली और चिकनी है तो यह उत्तम मानी गयी है ।

यदि शिला की कालिमा कुछ कम हो तो यह मध्यम श्रेणी की होती है ।

यदि उसमें दूसरा रंग भी मिला हो तो वह मिश्रित फल देने वाली होती है ।

शालग्रामशिला के स्पर्श करने मात्र से करोड़ों जन्मों के पापों का नाश हो जाता है । यदि उसका पूजन किया जाए तो उसके फल के विषय में कहना ही क्या !

चारों वेदों को पढ़ने और तपस्या से जो पुण्य होता है, वही पुण्य शालग्राम शिला की उपासना से प्राप्त हो जाता है ।

जिस घर में शालग्राम विराजते हैं वहां कोई अशुभ दृष्टि या अशुभ प्राणी प्रवेश नहीं कर सकता है ।

भूलकर भी नहीं रखें पूजा में ये शालग्राम

शूल के समान नुकीले शालग्राम की पूजा मृत्युकारक होती है ।

टेड़े मुख वाले शालग्राम की पूजा से दरिद्रता आती है ।

खंडित चक्र वाले शालग्राम की पूजा से मनुष्य रोगी हो जाता है ।

फटे हुए शालग्राम की पूजा मृत्युकारक होती है ।

और पिंगल वर्ण के शालग्राम की पूजा अनिष्ट को जन्म देती है । अत: इन सबकी पूजा नहीं करनी चाहिए।. “भगवान से बात”

      एक बेटी ने एक सन्त से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें। बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते हैं।
      जब सन्त घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे। एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी। सन्त ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहाँ पहले से ही रख दी गई।
      सन्त बोले, "मुझे लगता है कि आप मेरी ही प्रतिक्षा कर रहे थे।" पिता बोले, नहीं ! आप कौन हैं ?" सन्त ने अपना परिचय दिया और फिर कहा, "मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था।" पिता बोले, 'ओह ! ये बात, खाली कुर्सी, आप, आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाजा बन्द करेंगे।"
      सन्त को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाजा बन्द कर दिया। पिता बोले, "दरअसल इस खाली कुर्सी का राज मैंने किसी को नहीं बताया। अपनी बेटी को भी नहीं। पूरी जिंदगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है। मन्दिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता, वो सिर के ऊपर से निकल जाते थे, कुछ पल्ले नहीं पड़ता था। मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया। लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला। उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है। उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो। फिर विश्वास करो कि वहाँ भगवान खुद ही विराजमान हैं। अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो। मैंने ऐसा करके देखा, मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर तो मैं प्रतिदिन दो-दो घण्टे ऐसा करके देखने लगा। लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले। अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती।
      ये सब सुनकर सन्त ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की। सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा। सन्त को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था। इसलिए विदा लेकर चले गए।
      दो दिन बाद बेटी का सन्त को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घण्टे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे।
      सन्त ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई परेशानी तो नहीं हुई। बेटी ने जवाब दिया, "नहीं ! मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया। मेरा माथा प्यार से चूमा। ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आँखें मूंद चुके थे। लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज भी देखी। वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो। सन्त जी ! वो क्या था ?"
      ये सुनकर सन्त की आँखों से आँसू बह निकले। बड़ी मुश्किल से बोल पाए, "काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊँ तो ऐसे ही जाऊँ।"
                    ----------:::×:::---------

                       "जय जय श्री राधे"

     .                "

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