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डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 80 प्रतिशत भारतीयों को अभिशाप से मुक्ति दिलवाया: इंद्रदेव गुप्ता

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Dec 6, 2020

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 80 प्रतिशत भारतीयों को अभिशाप से मुक्ति दिलवाया: इंद्रदेव गुप्ता

लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेता इंद्रदेव गुप्ता ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ पर डॉ. भीमराव अंबेडकर को याद करते हुए कहा कि डॉ. अम्बेडकर की प्रतिभा अद्वितीय थी, वे एक मनीषी, लड़ाकू, दार्शनिक, समाजसेवी, एवं उच्च कोटि के राजनेता थे, जिन्होंने अपना समस्त जीवन समग्र भारत के कल्याण की कामना में लगा दिया, खासकर भारत के 80 फीसदी दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक आदि को अभिशाप से मुक्ति दिलाना ही डॉ. अम्बेडकर ने अपने जीवन का संकल्प बनाया।
डॉक्‍टर भीमराव अंबेडकर समाज में दलित वर्ग को समानता दिलाने के लिए जीवनभर संघर्ष करते रहे. इस दौरान उन्‍होंने दलित समुदाय के लिए पृथक निर्वाचन की एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की, जिसमें कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल न हो। 1932 में ब्रिटिश सरकार ने डॉ. अंबेडकर की पृथक निर्वाचिका के प्रस्‍ताव को मंजूरी दे दी, लेकिन इसके विरोध में महात्‍मा गांधी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसके बाद अंबेडकर ने अपनी मांग वापस ले ली, बदले में दलित समुदाय को सीटों में आरक्षण और मंदिरों में प्रवेश करने का अध‍िकार देने के साथ ही छुआ-छूत खत्‍म करने की बात मान ली गई। डॉक्टर अंबेडकर से जब एक बार किसी ने धर्म के बारे में जिक्र किया तो उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ उसी धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाएं।
इस तरह उन्होंने अपने समाज को आगे बढ़ाने के लिए 1936 में ‘स्वतंत्र लेबर पार्टी’ की स्थापना की, इस पार्टी ने 1937 में केंद्रीय विधानसभा चुनावों मे 15 सीटें जीतीं। 1941 और 1945 के बीच उन्‍होंने कई विवादित किताबें लिखीं, जिनमें ‘थॉट्स ऑन पाकिस्‍तान’ और ‘वॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्‍स’ भी शामिल रहा। इतना विवादित और कांग्रेस व महात्‍मा गांधी की आलोचना के बावजूद स्‍वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री सिर्फ वह अपनी विद्वता की वजह से बनाए गए इतना ही नहीं, 29 अगस्‍त, 1947 को अंबेडकर को भारत के संविधान मसौदा समिति का अध्‍यक्ष भी न‍ियुक्‍त क‍िया गया लेकिन डॉ अम्बेडकर ने 1952 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन भारतीय जनता ने उन्हें अपनी स्वीकृति प्रदान नहीं की और वह चुनाव हार गए. फिर उसी वर्ष मार्च 1952 में उन्हें राज्यसभा के लिए नियुक्त किया गया और अंत तक इसी सदन के सदस्य बने रहे
इस दौरान वह कई उतार-चढ़ाव से गुजरते रहे फिर एक दिन
डॉ अंबेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया तथा इस समारोह में उन्‍होंने श्रीलंका के महान बौद्ध भिक्षु महत्थवीर चंद्रमणी से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुए बौद्ध धर्म को अपना लिया बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उन्होंने इस धर्म पर अपनी पुस्तक ‘द बुद्ध एंड हिज़ धम्म’ लिखी इस पुस्तक के पूरा करने के तीन दिन बाद 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनका निधन हो गया, उनका अंतिम संस्कार मुंबई में बौद्ध रीति रिवाज के साथ किया गया डॉक्टर अंबेडकर के अंतिम संस्कार के समय उन्हें साक्षी मानकर करीब दस लाख समर्थकों ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। 1957 में बौद्ध धर्म पर लिखी गई उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई ।

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