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तंत्र,मन्त्र और यंत्र से सम्बंधित एक ज्ञानवर्धक प्रस्तुति

Byadmin

Jun 5, 2021

💐🌹 तंत्र,मन्त्र और यंत्र से सम्बंधित एक ज्ञानवर्धक प्रस्तुति 🌹💐

भौतिक विज्ञान आज अपनी उन्नति की चरम सीमा पर है, इसमें संदेह नहीं। मनुष्य के सुख-भोग से सम्बंधित अनेक प्रकार के साधन उपलब्ध हैं इस वैज्ञानिक युग में फिर भी जीवन में ऐसे पल आ जाते हैं जब मनुष्य अपने को बिलकुल निराश और असहाय-सा अनुभव करता है। यह वही पल है जब मनुष्य दैवीय शक्ति के सामने नत हो जाता है, झुक जाता है और समझने लगता है अपने को दीन-हीन।

ऐसा क्यों है?

इसलिये कि मनुष्य ऐसी शक्ति के आधीन है जो सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड में सामान रूप से विद्यमान है। उसी शक्ति को अध्यात्म कहता है-आदि शक्ति, नियंत्रणकारिणी शक्ति। वास्तव में वही एकमात्र् साधन है जिसकी खोज में मनुष्य हर जन्म में भटकता है और उसकी आत्मा उसे पाने के लिए बार-बार जन्म लेती है इस संसार में।

तंत्र, मन्त्र और यंत्र उसी शक्ति को मानव के कल्याण के लिए प्रकाशित करते हैं। कहने का मतलब यह है कि तंत्र, मन्त्र ,यंत्र वह माध्यम है जिसके द्वारा वह जगत नियंत्रणकारिणी शक्ति भौतिक जगत में अपने को प्रकट करती है और मनुष्य की कामनाओं को पूर्ण करती है। लेकिन यह तभी संभव है जब तंत्र, मन्त्र, यंत्र से सम्बंधित पद्धति के अनुसार तांत्रिक क्रिया, तांत्रिक अनुष्ठान और तांत्रिक प्रयोग किये जाएँ।

यह जानना आवश्यक है कि वैदिक पद्धति ,पौराणिक पद्धति और तांत्रिक पद्धति–ये तीन पद्धतियाँ हैं, जिनमें तांत्रिक पद्धति अपने आपमें गंभीर, गोपनीय और रहस्यमय है। जैसे वैदिक पद्धति और पौराणिक पद्धति में मन्त्रों का निर्माण होता है, उसी प्रकार तांत्रिक पद्धति में भी मन्त्रों का निर्माण होता है। यह कार्य सभी लोगों केे लिए संभव नहीं है। जिनके पास अपौरुषेय ज्ञान है वे ही मन्त्रों की रचना करने में समर्थ होते हैं और उस अपौरुषेय ज्ञान के अधिकारी ऋषिगण हैं या वे लोग हैं जो परम समाधि को उपलब्ध हैं।

मन्त्रों के आधार पर यंत्रों का निर्माण होता है। मन्त्र द्वारा यंत्र सिद्ध होने पर उसमें देवता के स्वरुप का आविर्भाव होता है और उसमें फिर उसकी शक्ति प्रकट होती है। तांत्रिक साधना- भूमि में यंत्र एक विशेष प्रकार का ‘शक्तिपीठ’ होता है–इसमें संदेह नहीं।

प्रत्येक देवता के तीन रूप हैं–विग्रहरूप, यंत्ररूप और मंत्ररूप। यंत्र की तरह विग्रह और मन्त्र भी शक्तिपीठ हैं। तीनों रूपों में समानता होने पर ही तीनों रूपों की सिद्धि संभव है।

प्रत्येक देवता का अपना एक मन्त्र और एक यंत्र होता है। किसी भी देवी-देवता की उपासना तभी सफल होती है जब उसके विधिवत् पूजन के साथ-साथ उसके यंत्र को धारण कर उसके मन्त्र का निर्धारित संख्या के अनुसार जप होता है।

देवता तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक, राजस और तामस। सात्विक देवता की उपासना उत्तरमुख, राजस देवता की उपासना पूर्वमुख और तामस देवता की उपासना पश्चिममुख बैठ कर की जाती है। प्रत्येक देवी या देवता का अपना एक विशिष्ट बीजाक्षर होता है जिसका अपना महत्व होता है। मन्त्र के प्रारम्भ में बीजाक्षर को जोड़ कर मन्त्र का जप करने से तुरंत लाभ होता है। जो व्यक्ति तंत्रोपासना के तथ्यों से अच्छी तरह परिचित है, वास्तव में वही सच्चा तंत्र-साधक है।

सच्चा तंत्र-साधक समाज से अपने को छिपा कर रखता है अन्यथा समाज उसे जीने नहीं देगा। उच्चकोटि के तंत्र-साधक की तंत्र-साधना पूर्णरूप से योगपरक होती है और उसका एकमात्र लक्ष्य होता है-महानिर्वाण। वे सिद्धियों के चक्कर में नहीं पड़ते वे। उनका जीवन अनासक्त और त्यागमय होता है। वे जंगलों में रहें या महलों में, वे सुख- ऐश्वर्यों में डूबे रहें पर वे रहेंगे बिलकुल निर्लिप्त। वे त्याग करेंगे तो दूसरों के लिए। उनका अपने लिए कुछ भी नहीं होगा। उनके लिए मात्र होगा-“आत्मवत् सर्वभूतेषु।”

-मन्त्र सिद्धि:——————–

मन्त्र की सिद्धि साधारण बात नहीं है। दैवीय शक्ति के निकट होने के लाभ का एकमात्र साधन यदि कोई है तो वह है- मन्त्र। मन्त्र का अर्थ है-मनन की जाने वाली वस्तु। मन्त्र-सिद्धि के लिए मन की एकाग्रता, विचारों की स्थिरता और प्राणों पर संयम अति आवश्यक है।

एकांत तो होना ही चाहिए। नदी का तट ,शिव या शक्ति का मंदिर, पर्वत आदि मन्त्र-साधना के लिए अनुकूल स्थान है। तांत्रिक मन्त्र की सिद्धि के लिए सबसे उपयुक्त स्थान श्मशान होता है। सभी प्रकार की तांत्रिक और यौगिक साधनाएं मन के ऊपर निर्भर हैं और मन है प्राण पर निर्भर। तात्पर्य यह है कि मन और प्राण की साधना ही एकमात्र योग और तंत्र की साधना है। जिसने अपने मन और प्राण पर अधिकार कर लिया और उन्हें संयमित कर लिया तो समझिये समस्त अभौतिक सिद्धियों के मार्ग खुल गए उसके लिए।

आज के मानव जीवन में जो असफलताएँ और जो समस्याएं हैं उनका एकमात्र कारण यही है कि मनुष्य का मन असंयमित हो गया है और हो गया है बहिर्मुखी। वह मन के पीछे पागलों की तरह भाग रहा है। इसी कारण देश और समाज के हर क्षेत्र में हा-हाकार मचा हुआ है। सब जगह अशांति फैली है।

मन के साथ प्राण का गहरा सम्बन्ध है। मन के अस्थिर और चंचल होने पर प्राण भी अस्थिर और चंचल हो उठता है। तीसरा है–विचार जिसका जन्म होता है मन और प्राण के मूल तत्वों से। विचार में आधा मन है और आधा है प्राण। मन की सहायता से वह स्थिर और एकाग्र होता है और प्राणों के योग से वह होता है गतिमान।

मन, प्राण और विचार तब तक अपने स्थान पर अकर्मण्य या अनुपयोगी हैं जब तक कि उनका योग ‘शक्ति’ से नहीं होता। शक्तियुक्त होने पर मन ,प्राण और विचार अपनी-अपनी सीमाओं को तोड़ कर असाधारण हो उठते हैं और तब उन्हें प्रचलित भाषा में मनःशक्ति, प्राणशक्ति और विचारशक्ति कहा जाता है।

प्रश्न यह उठता है कि कौन-सी शक्ति है वह आखिर कि जो तीनों को संचालित कर देती है ? वह शक्ति है–आत्मशक्ति। जैसे-जैसे मन ,प्राण और विचार एकाग्र ,स्थिर और संयमित होते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे उन्हें आत्मशक्ति उपलब्ध होती जाती है। यह जानना आवश्यक है कि आत्मशक्ति का जो समष्टि रूप है, उसे ‘पराशक्ति’, परमाशक्ति ,आद्याशक्ति ,महाशक्ति आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसी शक्ति का व्यष्टि रूप मानव शरीर में कुण्डलिनी शक्ति के रूप में विद्यमान है।

जहां तक प्रश्न मन्त्र-साधना का है, उसके लिए मनःशक्ति और प्राणशक्ति की ही आवश्यकता पड़ती है। मनःशक्ति और प्राणशक्ति के योग से मन्त्र, ‘सिद्धि’ की दिशा में आगे बढ़ता जाता है और एक समय ऐसा पल आ जाता है जब मन्त्र सिद्ध हो जाता है। सिद्ध हो जाने पर मन्त्र तत्काल अपना प्रभाव दिखलाता है।

संवाददाता

निहारिका

गुजरात

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