• Sat. Jun 25th, 2022

दिखावे के बालू को तोड़ कर प्रेम रूपी बीज को अंकुरित करो

Byadmin

Aug 14, 2021

🙏मीरा और माया दोनों सगी बहने थी ।दोनों मेंबहुत ज्यादा प्यार था एक साथ उठना बैठना खाना-पीना खेलना और स्कूल भी एक साथ ही जाती थी ।जब भी वह दोनों सुबह स्कूल जाती तो रास्ते में पड़ते ठाकुर जी के मंदिर में मन को पुलकित करने वाली और उनके कर्ण को सुख देने वाली घंटे की ध्वनि उन दोनों को बहुत ही आकर्षित करती थी ।उनका मन बहुत होता कि वह मंदिर में ठाकुर जी के दर्शन करके आए लेकिन स्कूल जाने में उनको देरी ना हो जाए इसलिए वह दोनों मायूस सी ललचाई नज़रों से बस मंदिर को दूर से ही निहारती हुई चुपचाप वहां से निकल जाती ।1 दिन दोनों ने निश्चय किया कि वह स्कूल से आते वक्त मंदिर में होकर जाएंगी अगले दिन वह आपने मां को कहकर आई की मां आज हमें आने में देरी होगी क्योंकि आज हमें अपनी मंदिर में ठाकुर जी के दर्शन करने जाना है मां ने भी सहर्ष हामी भर दी । आज दोनों स्कूल से आते वक्त मंदिर में ठाकुर जी के दर्शन करने गई ।मंदिर का पुजारी और उसकी बीवी बहुत श्रद्धा भाव से ठाकुर जी की पूजा अर्चना करते, ठाकुर जी को भोग लगाते लेकिन मंदिर का पुजारी थोड़ा सा कठोर और अभिमानी था मंदिर में आने वाले भक्तों को तो वह कुछ नहीं कहता था परन्तु मंदिर के पास बैठे भिखारी बाबा से पुजारी को बहुत चिढ़ थी वो चाहता था कि यह भिखारी यहां से चला जाए जो कि बहुत सालों से मंदिर की सीढ़ियों के पास एक कंबल बिछाकर बैठा रहता था। पुजारी जी को लगता था कि भिखारी बाबा के मंदिर के आगे बैठे रहने के कारण मंदिर की सारी शोभा खत्म हो जाती है। आज मीरा और माया ठाकुर जी की प्रतिमा को देखकर बहुत आनंदित हुई जब उन्होंने आसपास देखा तो मंदिर की सीढ़ियों में बहुत ज्यादा फिसलन थी तो उन दोनों ने जल्दी-जल्दी मंदिर को साफ करना शुरू कर दिया जब पुजारी ने दोनों लड़कियों को मंदिर साफ करते देखा तो बहुत खुश हुए और उन्होंने खुश होकर उन दोनों को ठाकुर जी को लगाए गए भोग में से कुछ प्रसादी एक पत्तल में डाल कर दे दी स्कूल से आने के कारण दोनों बच्चियों को बहुत भूख लगी थी वह दोनों प्रसादी पाकर बहुत ही प्रसन्न हुई और जाकर मंदिर की आखिर वाली सीढ़ी में बैठकर जब दोनों खाने लगी तभी उनका ध्यान पास में बैठे भिखारी पर पड़ा जो कि बहुत ही वृद्ध था औरएक कंबल बिछाकर जमीन पर बैठा हुआ था जब दोनों खाने लगी तो भिखारी की दृष्टि उनके भोजन की तरफ ही थी और वह ललचाई नजरों से उनके भोजन की तरफ देखने लगा माया और मीरा को पता चल गया कि बाबा को भूख लगी है वह अपने पत्तल को लेकर जिस पर भोजन पड़ा हुआ था जाकर भिखारी बाबा के पास जाकर बैठ गई और कहने लगी आओ बाबा हम मिलकर ठाकुर जी की भोग प्रसादी पाते हैं बाबा को भूख लगी हुई थी और तीनों ने एक ही पत्तल में भोग प्रसादी को खाना शुरू कर दिया और मीरा और माया ने एक दूसरे को आंखों में इशारा किया कि वह धीरे-धीरे भोजन करें ताकि भिखारी बाबा भोजन खा सके और उनका पेट भर जाए आज भोजन पा कर बाबा की आंखों में पेट भरने की संतुष्टि साफ नजर आ रही थी ।माया और मीरा मुस्कुराती हुई वहां से जल्दी-जल्दी मंदिर को और भिखारी बाबा को प्रणाम कर के वहां से घर की तरफ चल दी। अगले दिन फिर वह मंदिर के दर्शन करने गई ।। इन दोनों बच्चियों के प्रति पुजारी जी का व्यवहार बहुत कोमल हो चुका था तो पुजारी ने उनको कहा कि लाली तुम दोनों रोज मंदिर साफ कर दिया करो उसके बदले में तुम दोनों मेरे से भोजन प्रसादी ले लिया करो तभी मीरा अचानक से बोल पड़ी पुजारी काका हम रोज मंदिर साफ कर दिया करेंगे क्या आप हमारे साथ साथ वो नीचे जो भिखारी बाबा बैठे हुए हैं उनको भी प्रसादी दे दिया करोगे इतना सुनते ही पुजारी भड़क उठा और अपनी कर्कश आवाज से लगभग चिल्लाता हुआ बोला इन भिखारियों का हमने ठेका नहीं ले रखा और प्रसादी तुम दोनों को ही मिलेगी ।पुजारी इतनी जोर से बोला कि दोनों बच्चियां सहम सी गई और चुपचाप जाकर मंदिर की सीढ़ियों को साफ करने लगी ।पुजारी ने उन दोनों को एक पत्तल में प्रसादी डाल कर दे दी मीरा और माया फिर जाकर भिखारी बाबा के पास जाकर बैठ गई अभी वह तीनों भोजन कर ही रहे थे तभी एक तीन चार साल का बालक अपनी टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलता हुआ उस कंबल पर आकर बैठ गया और उनकी भोजन में अपनी छोटी सी उंगली प्रसादी में डालकर और फिर मुंह में डालकर खाने लगा । माया और मीरा उस बालक को देख कर हैरान हो गई और पूछने लगी अरे ओ लाला तुम कौन हो और यहां क्या कर रहे हो? उस सांवरे सलोने से बालक ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने अगले बड़े बड़े दो दांत निकाल कर और अपनी छोटी सी नाक को ऊपर चढ़ा कर बस हंस पड़ा और फिर उंगली डालकर भोजन में अपने मुंह में डालने लगा। मीरा और माया को उस बालक पर बहुत प्यार आया और अब तो हर रोज पुजारी जी द्वारा दी गई ठाकुर जी की भोग प्रसादी को मीरा माया भिखारी बाबा के पास ले जाकर बैठ जाती और साथ साथ वह बालक भीउनके साथ भोजन के समय पता नहीं कहां से आकर उनके साथ आकर बैठ जाता ।चारों मिलकर बड़े आनंद से प्रसादी ग्रहण करते।
1 दिन मीरा और माया ने देखा की पुजारी जी के मुख पर चिंता के भाव है ।उन्होंने कहा पुजारी काका आजकल आप इतना चिंतित क्यों रहते हो तो पुजारी ने कहा लाली कुछ दिनों से मैं अब जब भी ठाकुर जी को भोग लगाता हूं तो न जाने उस भोग में ऐसा क्या होता है की चपाती सूख जाती है ,चावल एकदम कड़क हो जाते हैं ,दाल और सब्जी खराब हो जाती है ,ठाकुर जी के आगे रखा हुआ जल्दी पीला पड़ जाता है ऐसा काफी दिनों से हो रहा है कि हमें ठाकुर जी की प्रसादी खाने को नहीं मिलती । तभी अचानक पुजारी जी प्रश्न सूचक दृष्टि से मीरा और माया की तरफ देखते हुए बोले वही प्रसादी मैं तुमको देता हूं क्या वह प्रसादी खराब होती है तो माया और मीरा दोनों एकसाथ बोली नहीं पुजारी काका हम तो बड़े चाव से उस प्रसादी को खाते हैं वह प्रसादी तो अमृत समान होती है। पुजारी जी चुपचाप हैरान होकर खड़े रहे और सोचने लगे ऐसा कैसे होता है।
एक दिन अचानक से बहुत ज्यादा तेज आंधी आने लगी धीरे-धीरे आंधी ने तूफान का रूप ले लिया और जोर-जोर से हवा के साथ बहुत तेज बारिश होने लगी पुजारी जी ने ठाकुर जी को भोग लगाकर आगे से पर्दा किया हुआ था। मीरा और माया मंदिर की नीचे वाली सीढ़ी पर भिखारी बाबा के साथ बैठकर प्रसादी ग्रहण कर रही थी अब तो वह बालक मीरा और माया के साथ इतना घुल मिल गया था कि वह अब कभी मीरा की गोद में बैठ कर भोजन करता और कभी माया की गोदी में बैठ कर। हवा इतनी तेज थी की अचानक से ठाकुर जी के आगे का पर्दा जोर जोर से हिलने लगा । तभी अचानक से पुजारी जी का ध्यान मंदिर के अंदर गया तो एकदम से हैरान रह गए कि ठाकुर जी की प्रतिमा मंदिर के गर्भगृह में है ही नहीं। प्रतिमा को न देखकर पुजारी जी घबराकर मूर्छित हो गए थोड़ी देर बाद मूरछा खुलने पर पुजारी जी ने देखा कि पंडिताइन उसको जोर जोर से हिला कर घबराकर पूछ रही है क्या हुआ पंडित जी आपको क्या हुआ ।पुजारी जी इतने घबराए हुए थे केवल उंगली के इशारे से मंदिर के परदे की तरफ इशारा करते हुए धीरे-धीरे आवाज से बोले “मेरे गोपाल मेरे गोपाल”
। लेकिन पंडिताइन उनका इशारा ना समझ सकी। पंडित फिर मूर्छित होकर गिर पड़ा फिर थोड़ी देर बाद होश आने पर जोर-जोर ठाकुर जी के विरह में विलाप करने लगा आंखों में अश्रुओं की जैसे गंगा यमुना बह रही थी बार-बार वह ठाकुर जी को पुकार रहा था मेरे ठाकुर जी कहां गए मेरे ठाकुर जी कहां गए ।इतनी देर में माया मीरा उस बच्चे को गोद में उठाकर मंदिर के द्वार पर आकर खड़ी हो गई क्योंकि नीचे अत्यधिक आंधी और तूफान था। तूफान अपने पूरे उफान पर था ,भारी बारिश के कारण मंदिर की सीढ़ियों पर पानी आ गया।उस जोर दार तूफान से बचने के लिए भिखारी बाबा भी मंदिर की सीढ़ियों को चढता हुआ मंदिर के द्वार पर आ खड़ा हुआ । जब मीरा और माया ने पुजारी जी की ऐसी हालत देखी तो उन्होंने जाकर पुजारी जी के आंसू पोंछे और पूछा पुजारी काका क्या हुआ? लेकिन पुजारी अपने ठाकुर जी को ना पाकर जार जार रोता हुआ विलाप करने लगा और कहने लगा
‘”आओ गोपाल तरस रहे नैना आओ नंदलाल तरस रहे नैना” इतना कहते-कहते उसकी आंखों से लगातार अश्रु बह रहे थे तभी मीरा और माया की उंगली को छुड़ाकर वह छोटा सा बालक उस पर्दे के अंदर मंदिर के गर्भगृह में चला गया। पुजारी जी ने जब उस बालक को अचानक से गर्भगृह में जाते हुए देखा तो एकदम से हैरान हो गए जब जोरदार हवा के कारण मंदिर का पर्दा फिर से हिला तो पुजारी जी ने मंदिर के अंदर देखा तो ठाकुर जी वहां पर विराजमान थे। मीरा और माया का ध्यान पुजारी जी की तरफ था उनको पता ही ना चला कि कब वह बालक उनकी उंगली को छुड़ाकर मंदिर के गर्भगृह में चला गया है। उस बालक को वहां न पा कर वह दोनों चिंतित होती हुई उस को लाला,ओ लाला कहां हो ऐसा कह कर जोर जोर से आवाजें देने लगी। लेकिन वह बालक उनको कहीं न दिखा। तभी भिखारी बाबा , मीरा और माया का ध्यान मंदिर के गर्भगृह में ठाकुर जी की प्रतिमा पर गया और मीरा और माया ने देखा कि ठाकुर जी की प्रतिमा अपने अगले दो बड़े बड़े दांत निकाल कर और अपनी छोटी सी नाक को ऊपर कर के मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। अब तो उन सब को समझते देर न लगी कि वह कोई छोटा बालक नहीं ठाकुर जी ही उन के साथ बैठकर भोजन करने आते थे। पुजारी जी को भी अब अपनी गलती का एहसास हुआ कि अभिमान वश वह ठाकुर जी को भोग लगाता था लेकिन ठाकुर जी तो प्रेम और भाव के भुखे होने के कारण इन बच्चियों और भिखारी काका के साथ परसादी खाते थे ।पुजारी को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था वह भिखारी के चरणों में गिर पड़ा और कहने लगा बाबा मुझे माफ कर दो आज मुझे एहसास हो गया ठाकुर जी प्रेम और भाव के भूखे हैं ना कि अहंकार और दिखावे के अब मुझे समझ आ गया है कि ठाकुर जी हर एक के अंदर विराजमान है चाहे वह कोई सेठ हो या भिखारी हो। उस दिन मीरा और माया के कहने पर भी मैंने आपको भोग प्रसादी देने से अभिमान वश मना कर दिया था शायद इसलिए मेरे गोपाल मुझ से रुठ कर आप सब के साथ भोग प्रसादी ग्रहण करने आते थे और मेरे द्वारा लगाया गया भोग खराब हो जाता था।
पुजारी भिखारी बाबा को प्रणाम करते हुए और क्षमा मांगते हुए कहने लगा कि बाबा हम तो ठाकुर जी की सुबह शाम सेवा करके अपने घर चले जाते थे लेकिन आप तो दिन रात उनके मंदिर के द्वार पर पहरा देते रहते थे।उनके असली लाडले तो आप हो।
और पुजारी जी मीरां और माया को गले लगा कर उनके मस्तक को चुमते हुए कहने लगे लाली आज तुम दोनों के नाम ने मेरे जीवन की दशा को ही बदल दिया है। इस माया ने मेरी आंखों पर बंधी अंहकार रुपी माया की पट्टी को हटा दिया है और मीरा ने अपने नाम की तरह मीराजैसी सच्ची भक्ति की भावना का दीपक मेरे अंदर प्रज्वलित कर दिया है।

इस लिए हमें ठाकुर जी को पाना है तो अपने अंदर अंहकार और

दिखावे के बालु को तोड़ कर प्रेम रूपी बीज को अंकुरित करो ताकि उसमें से भक्ति का पौधा पनप कर आपके जीवन को हरा भरा कर दे।।

बोलो भगत वत्सल भगवान की जय हो

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

AllEscort