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पारस से पारस

Byadmin

Aug 29, 2021

. ★★★★ ● ” पारस से पारस “

यदि कोई कहे कि भजन करते हुए आनंद और शांति नहीं मिल रही तो इसका कोई कारण अवश्य होना चाहिये ।
ये कभी नहीं हो सकता कि लोहा पारस को छू जाये और सोना न बने । लोहा ही मैला और खोटा या जंग लगा हो तो पारस क्या करे । यदि लोहा और पारस पास-पास होते हुए भी लोहे की दशा नहीं बदलती तो समझ लेना चाहिये कि बीच में अवश्य कोई पर्दा रह गया है , चाहे वह कितना ही बारीक क्यों न हो , उस पर्दे ने लोहे को पारस से टकराने नहीं दिया है ।।
पारस के स्पर्श से साफ लोहा सोना जरूर बन सकता है पर पारस नहीं , मगर सन्त जो हैं जीव को नामदान देकर , नाम की कमाई करवा कर , अपनी शरण में लेकर उसे अपना ही रूप बना लेते हैं ।
जरूरत है दृड़ विश्वास की , जो संतों की बात पर विश्वास करता है तो सन्त भी भृंगी के समान उस शिष्य को अपना रुप बनाना चाहते हैं ।।
यही अन्तर है गुरु में और पारस में , पारस तो लोहे को सोना ही बना सकता है परन्तु गुरु सच्चे नाम की कमाई वाले शिष्य को अपने समान ही महान बना लेते हैं ।।

” हम निरगुणी मधुर अति फीके ,
मिलियन सतिगुर पारसु कीजै ।”
~गुरु रामदास जी

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान।
वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।।
~ संत कबीर

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