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प्रार्थना के लिए एक मंदिर का होना जरूरी नहीं

Byadmin

Apr 7, 2022

प्रार्थना के लिए एक मंदिर का होना जरूरी नहीं मगर एक स्वच्छ मन का होना जरूरी है। निष्कपट मन से की गई प्रार्थनाएं कभी व्यर्थ नहीं जाया करती है। जीवन पथ पर जब परिणाम आपकी आशा के विपरीत हों और अपने हाथ में कुछ भी न हो तो उन क्षणों में प्रभु से की गई प्रार्थना हमारे आशा के दीपक को प्रदीप्त रखता है।

जीवन में सदा परिणाम उस प्रकार नहीं आते जैसा कि हम सोचते और चाहते हैं। किसी भी कर्म का परिणाम मनुष्य के हाथों में नहीं है मगर प्रार्थना उसके स्वयं के हाथों में होती है। प्रार्थना व्यक्ति के आत्मबल को मजबूत करती है और प्रार्थना के बल पर ही व्यक्ति उन क्षणों में भी कर्म पथ पर डटा रहता है जब उसे ये लगने लगता है कि अब हार सुनिश्चित है।

प्रार्थना में एक अदृश्य शक्ति समाहित होती है। आप प्रार्थना करना सीखिए! प्रार्थना आपको आशावान बनाकर तब भी पूरी शक्ति के साथ आगे बढ़ना सीखाएगी जब आप घोर निराशा से घिरे हुए हों।

!!!…परमात्मा की प्राप्ति में पात्र की नहीं पात्रता की जरुरत है-…!!!

प्रकृति का काम तो सिर्फ हमें मिलाना होता है , लेकिन संबंधों की दूरियों या नजदीकियों का निर्धारण हमारा व्यवहार करता है…

जिंदगी का रास्ता कभी बना बनाया नही मिलता है स्वयं को बनाना पड़ता है ,जिसने जैसा मार्ग बनाया उसे वैसी ही मंजिल मिलती है..

कठपुतली होना
कोई आसान काम नहीं है।
कठपुतली होना
इस संसार में सबसे कठिन काम है।
अगर गीता को एक शब्द में रखना हो,
तो इतना ही कहा जा रहा है कि..
कठपुतली हो जाइये।
आप सिर्फ निमित्त मात्र हो जाएँ।
करने दे उसे.. जो वह कर रहा है।
खींचने दे उसे धागे,
आप नाचिए, उसकी मर्जी जैसा नचाये!
आप बीच में बाधा न बनें।
शरणागति का और क्या अर्थ है?
इसका इतना ही अर्थ है कि
अब मैं अपने आप को आपके
हवाले करता हूँ

!!!…क्रोध आने पर चिल्लाने के लिए ताकत नहीं लगती है बल्कि क्रोध आने पर शांत रहने के लिए ताकत की ज़रूरत होती है…!!!

हरे कृष्णा हरे कृष्णा
कृष्णा कृष्णा हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे

राधे कृष्णा राधे कृष्णा
कृष्णा कृष्णा राधे राधे
राधे श्याम राधे श्यामा
श्याम श्यामा राधे राधे.

हरे कृष्णा हरे कृष्णा
कृष्णा कृष्णा हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे

     *वर्तमान में हरिनाम जप की ऋतु आयी हुई है। वर्षा ऋतु में खेती बढ़िया होती है। हरिनाम जप सस्ता मिलता है, मँहगा बिकता है। हरिनाम जप में समय तो सत्ययुग के अनुसार लगता है, पर फल मिलता है कलियुग के अनुसार। आप हरिनाम जप का स्वभाव बना लें।*

       *गया समय फिर मिलेगा नहीं, पर जो समय हाथ में है, उसे अच्छे-से-अच्छे काम में लगाओ। जबतक थोड़ी भी रस्सी हाथ में है, कुएँ से जल निकाल सकते हैं, पर रस्सी ही हाथ से निकल गयी तो ?*

       *दूसरे को भगवान्‌ में लगाने के समान कोई पुण्य नहीं है। दूसरे को भोजन दोगे तो उसे पुनः भूख लग जायगी, पर भगवान्‌ में लगा दोगे तो अनन्त जन्मों की भूख मिट जाएगी।*

!!!…मजबूत होने में मजा ही तब है, जब सारी दुनिया कमजोर कर देने पर तुली हो…!!!

जय श्री कृष्ण🙏🙏

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