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फार्मा कम्पनियों के दुष्चक्र और कट और कमीशन के मकड़जाल

Byadmin

May 25, 2021

मेरा बेटा अपनी आजीविका के लिए एलोपैथी का मेडिकल एजेंसी का संचालक है मै भी 1990 के दशक में रघुवंश फार्मा का प्रोपराइटर रह चुका हूं और मॉडर्न मेडिकल साइंस की अनेक उपलब्धियों और एविडेन्स बेस्ड तार्किक प्रणाली का कायल हूँ. वहीं फार्मा कम्पनियों के दुष्चक्र और कट और कमीशन के मकड़जाल से भी परिचित हूँ।

2008 में मैं पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में योग शिविर में भी गया हालाँकि मेरा सबसे प्रबल आकर्षण था भाई राजीव दीक्षित जी से मिलने और उन्हें सुनने का. कालांतर में मैंने फैनबॉय की मानसिकता से निकल कर बाबा रामदेव और राजीव दीक्षित जी, दोनों व्यक्तित्वों की संयमित संतुलित समीक्षा करने में सफलता पाई और दोनों को उनकी सामाजिक उपयोगिता के सीमित संदर्भ में स्वीकार किया. भाई राजीव दीक्षित जी का असमय प्रयाण हो गया, वहीं बाबा का आभामंडल भी समय के साथ थोड़ा धूमिल हो गया.

मैंने योग को व्यक्तिगत जीवन में उपयोगी पाया, हालाँकि इसे नियम से करने का अनुशासन नहीं जुटा पाया. वहीं आयुर्वेद के बारे में अपने अज्ञान को स्वीकारते हुए सिर्फ इतना कहूँगा की इसकी प्रैक्टिस में एक ठहराव, एक स्टैग्नेशन आ गया है और इसे एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रतिस्पर्धा में उतरने की आवश्यकता है।

दूसरी ओर जहाँ लोग बाबा रामदेव की व्यापारिक वृति की आलोचना करते हैं, वहीं मैं उनकी व्यावसायिक सफलता का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ. बाबा ने थोथी बयानबाजी नहीं की, खोखले विक्टिमहूड के शिकायती मोड में आने के बजाय उन्होंने चट्टानी चुनौतियों को काट कर अपनी राह निकाली. जिन्हें उससे प्रेरणा लेनी थी उन्होंने प्रेरणा ली, जिन्हें सिर्फ मीनमेख निकालना था उन्होंने मीनमेख निकाला।

बाबा की बहुत सी बातें मुझे भी उनका बड़बोलापन लगती हैं. पर उनकी ज्यादातर आलोचना के पीछे की ग्रंथि या तो उनकी व्यावसायिक सफलता के प्रति एक ईर्ष्या है, या फिर उनका हिन्दू संस्कारों के प्रति आग्रह का खुला प्रदर्शन।

 आज देश में अनेक हॉस्पिटल और संस्थान हैं जो खुल कर मेडिसिन को ईसाइयत के प्रचार का टूल बनाये हुए हैं. उन्होंने हर आपदा को ईसाइयत के प्रचार का अवसर समझा है. देश में गरीबी और खस्ताहाल मेडिकल व्यवस्था धर्म परिवर्तन की फसल के लिए खाद का काम करती रही है और इसलिए मिशनरियाँ हमेशा आर्थिक विकास को अवरुद्ध करने में सक्रिय रही हैं. IMA के प्रेजिडेंट डॉ जयालाल इस धन्धे के अकेले दलाल नहीं हैं।

यह लड़ाई आयुर्वेद बनाम एलोपैथी नहीं है, यह पतंजलि योगपीठ बनाम IMA भी नहीं है. असली लड़ाई हिन्दू धर्म बनाम ईसाई मिशनरियों की है. इस विभाजन रेखा को स्पष्ट रखें. इसे आयुर्वेद बनाम एलोपैथी दिखाने से आप इन सोल हार्वेस्टर्स के हाथ में मेडिकल साइंस की दराँती पकड़ा कर उन्हें अपनी फसल काटने के लिए खुला खेत दे देंगे।

ब्यूरो चीफ

दिनेश सिंह

आजमगढ़

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