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बर्तनों में खाना

Byadmin

Jan 17, 2022

:-: बर्तनों में खाना :-:
बुद्धिजीवियों द्वारा यह आरोप लगाया जाता हैं कि ब्राह्मण ,दूसरी जाति के लोगों के घरों या बर्तनों में खाना नहीं खाते थे।यह बात बिल्कुल सत्य हैं।वैदिक ब्राह्मण सात्विक जीवनशैली अपनाते थे,प्याज व लहसुन तक का सेवन नहीं करते थे,तो मांस मदिरा का सेवन ब्राह्मणों के लिए प्रतिबंधित था।जब कोई सात्विक ब्राह्मण किसी के घर पर जाता तो,उसे नये बर्तनों में खाना पका कर दिया जाता हैं और जो लोग मांस मदिरा,या तामसिक,राजसिक भोजन इत्यादि खाते थे,वह स्वयं ही ब्राह्मणों के भोज के लिए अपने घरों में अलग बर्तन रखते थे।यह व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी देखी जा सकती हैं।जिन बर्तनों में भोजन पकता हैं, उनमें उस भोजन के प्रभाव के अनुसार,उसी प्रकार की ऊर्जा का संचरण होता रहता हैं।जैसे आजकल जैन या शाकाहारी भोजनालय अलग होते हैं और शाकाहारी या जैनी लोग मांसाहार भोजनालय में जाकर नहीं खाते।हम सब जानते हैं कि यह कोई छुआछूत नहीं हैं और न ही कोई मांसाहारी भोजनालय वाला व्यक्ति इस बात से अपमानित अनुभव करता हैं कि कोई शाकाहारी या जैनी व्यक्ति ने उसके यहाँ भोजन नहीं किया,अगर किसी कारणवश किसी मांसाहारी व्यक्ति के यह किसी जैनी या शाकाहारी व्यक्ति को भोजन करना पड़ा,तो आज भी उसके लिए अलग बर्तनों का उपयोग किया जाता हैं।ठीक वैसे ही यह व्यवस्था पहले भी लागू थी और आज भी हैं।जो व्यक्ति शाकाहार या सात्विक भोजन लेता हैं, उन पर यह व्यवस्था सृष्टि के आरंभ से अंत तक इसी प्रकार लागू होगी,लेकिन जो मंगलवार या शनिवार छोड़कर या अन्य व्रत या पर्वो को छोड़कर मांसाहार या तामसिक भोज्य लेते हैं, यह व्यवस्था उन पर लागू नहीं होगी,चाहे वो अपने को कथित ब्राह्मण समझें या जैनी या कोई और,क्योंकि इस प्रकार कभी मांसाहारी या तामसिक भोजन लेने या कभी न लेने के नियम उनके स्वयं के बनाएं हुए हैं, यह वैदिक नियम नहीं हैं।विजय सत्य की ही होगी।

धन्यवाद :- बदला नहीं बदलाव चाहिए

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