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भारतीय जातिवाद

Byadmin

Nov 19, 2021

:-: भारतीय जातिवाद :-:
सत्ता सुख और अज्ञानता के कारण जिस भारतीय जातिवाद को ऊंच नीच या असमानता कहा जाता हैं, वास्तव में वह आनुवांशिकी विज्ञान( genetics science ) पर आधारित हैं।जब दो एक ही तरह के जाति (व्यवसाय) वाले लोग ,आपस में विवाह करते हैं, तो उनके होने वाली संतान में,उस व्यवसाय के व्यवसायिक गुण अपने आप आ जाते हैं,इस तरह का व्यक्ति पैदाइशी हुनरमंद होता हैं ,जिससे बेरोजगारी नहीं होती।कोई भी इन जातिगत व्यवसायों को अपनी योग्यता और कर्मानुसार ग्रहण कर सकता हैं और उसमें बदलाव कर सकता हैं।आज भी वैसा ही होता हैं नेता की संतान नेता,डॉक्टर की संतान डॉक्टर बनने की सम्भावना सबसे अधिक रहती हैं।कोई भी व्यवसाय छोटा या बड़ा नहीं होता,बस उस व्यवसाय का समाज पर कैसा और क्या प्रभाव हैं, उस आधार पर व्यक्ति को मान सम्मान और सुविधाएं मिलती हैं जैसे कलेक्टर का व्यवसाय ऊंचा यानि श्रेष्ठ हुआ ,और चपरासी का व्यवसाय नीचा यानि छोटा हुआ,कोई भी व्यक्ति चपरासी बन सकता हैं, लेकिन सर्वश्रेष्ठ योग्य व्यक्ति ही कलेक्टर बनेगा।जैसे डाकू होने के बाद भी वाल्मीकि ऋषि बनें।सनातन व्यवस्था में जो लोग समाज के प्रसाशनिक कार्यो को करते थे,आज की तरह उन्हें ही सम्मान अधिक मिलता था।जातिव्यवस्था कर्म आधारित थी और उन कर्मो का विभाजन वर्ण व्यवस्था के अनुसार करके कार्यो को चार श्रेणी में बांटा गया था,जैसा आज भी होता हैं जैसे प्रथम श्रेणी कर्मचारी या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी।धर्म स्थापना के लिए,सनातन वर्णव्यवस्था के पुनः लागू होने का समय निकट ही हैं ।
धन्यवाद :- बदला नहीं बदलाव चाहिए

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