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भारत में प्रायः सभी प्रकार के पदों के लिए निर्धारित चयन-प्रक्रियाएं अत्यंत दोषपूर्ण हैं ।

Byadmin

Jun 13, 2021

भारत में प्रायः सभी प्रकार के पदों के लिए निर्धारित चयन-प्रक्रियाएं अत्यंत दोषपूर्ण हैं । यूजीसी ने असिस्टेंट प्रोफेसरों के अभ्यर्थियों के संक्षिप्तीकरण और चयन के लिए जो मानदंड बनाये हैं, उनका उद्देश्य सरकारी घोटाले को प्रश्रय देना प्रतीत होता है, वरना नेट/जेआरएफ के बाद किसी परीक्षा की जरूरत नहीं थी । उसके बाद नियुक्ति-प्रक्रिया शुरू की जा सकती थी । अभ्यर्थियों की सभी परीक्षाओं में वही अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय है

यूजीसी के मानदंडों की समीक्षा

(1)यूजीसी ने स्नातक एवं स्नातकोत्तर के प्राप्तांकों के लिए 40 अंक निर्धारित किये हैं ।

पूरे देश के विश्वविद्यालयों में अंक देने का कोई बहुमान्य मानदंड निर्धारित नहीं है ।एक ही उत्तर पर कहीं 50 मिल सकता है तो कहीं 85 भी । इसके साथ ही कहीं कदाचार मुक्त परीक्षा होती है तो कहीं कदाचार युक्त । बहुत जगह पैरवी पर अंक बढ़ाये जाते हैं । ऐसी स्थिति में विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा एक ही स्तर के उत्तरों पर विभिन्न अंक मिलने के कारण उसे चयन प्रक्रिया में शामिल करना न्यायसंगत नहीं है ।

(2) पीएचडी पर 30 अंक ऐसे अभ्यर्थियों को घुसाने के लिए रखे गये हैं जो पढ़ने-लिखनेवाले नहीं हैं, लेकिन किसी से लिखवाकर पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली है तीन साल पर मिलने वाली पीएचडी डिग्री पर 30 अंक और डेढ़ साल पर मिलनेवाली एम फिल् डिग्री पर 7 अंक रखने के पीछे क्या तर्क है ? एम फिल् पर पीएचडी का आधा अंक क्यों नहीं मिलना चाहिए ?

विश्वविद्यालयों से जितनी भी डिग्रियां मिलती हैं, उनमें सबसे हल्की, सबसे सस्ती डिग्री पीएचडी की ही है । शायद ही कभी कोई इसमें फेल होता हो ! रजिस्ट्रेशन के बाद ही डिग्री पक्की हो जाती हैं । कहीं किसी को थोड़ी चमचागिरी करनी होती है और कहीं किसी को थोड़े पैसे खर्च करने होते हैं !सर्वाधिक जाली डिग्री पर सर्वाधिक अंक किसी अचंभे से कम नहीं !

  1. सभी परीक्षाओं में सर्वाधिक कठिन और सर्वाधिक विश्वसनीय डिग्री जेआरएफ पर 7 अंक ! बता सकते हैं क्यों ? इसलिए कि नेताओं के कैंडिडेट इसे प्राप्त करने में विफल रहते हैं ! आंखों के सामने इस अन्याय को देखकर भी आंदोलन न होना दर्शाता है कि देश के युवा गाढ़ी नींद में हैं !

सभी परीक्षाओं में अधिक प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों के चयन के लिए उपयुक्त होने के बावजूद मैं नेट की परीक्षण-पद्धति को अपनी चयन-प्रक्रिया में स्थान नहीं दूंगा, क्योंकि यह परीक्षा वस्तुनिष्ठ पद्धति पर आधारित है । इससे अभ्यर्थियों की भाषिक अभिव्यक्ति-क्षमता का परिचय नहीं मिलता और इसी क्षमता का सर्वाधिक उपयोग अध्यापन में होता है ! इससे रटने की क्षमता का परीक्षण होता है, जो सरकार के बहुत काम की चीज होती है । यूनिवर्सिटी में वह खुद रटेगा और विद्यार्थियों से रटवायेगा । धीरे-धीरे मौलिक ज्ञान समाप्त हो रहा है । बचा-खुचा भी समाप्त हो जायेगा । दुष्ट शक्तियों का अकंटक राज चालू रहेगा ।

(4) शिक्षण अनुभव पर 2 अंक प्रति वर्ष के हिसाब से पांच वर्षों के अनुभव पर 10 अंक रखे गये हैं !नेता लोग इसका जुगाड़ आसानी से कर लेंगे । बिना किसी ठोस चयनप्रक्रिया से गुजरे जो जहाँ पढ़ा रहे हैं, हो सकता है उनमें कुछ लोग अच्छा भी पढ़ाते होंगे । तो अच्छा और बुरा पढ़ानेवालों को एक ही नंबर कहाँ का न्याय है ? एक बात और ! जो बुरा पढ़ा रहा है, वह पांच साल के अभ्यास में बुरा पढ़ाने में सिद्ध हो जायेगा । तो क्या बुरा पढ़ाने में कुशल हो जाने के लिए उन्हें 10 अंक दिये जायेंगे ? योग्यता को पुरष्कृत कर रहे हैं या अयोग्यता को ?

(5). शोध पत्रों के प्रकाशन पर भी जो 10 अंक रखे गये हैं, वे भी नेताओं के बड़े काम के हैं ! किसी से लिखवाकर पांच पत्र छपवाना कोई मुश्किल काम नहीं । इसी काम के लिए बहुत सारी पत्रिकाएं निकल रही हैं । संभव है, उनके संपादकों ने पैरवी से यूजीसी की सूची में भी स्थान पा लिया हो !

(6) अंतरराष्ट्रीय/राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए 3 अंक रख दिये गये हैं , जो तिकड़मबाजों के विशेष काम की चीज है ।

अगर संयोगवश कोई अवार्ड सही भी हो तो अच्छे शिक्षक के लिए तभी उपयोगी है सकता है, जब उसी क्षेत्र के वे शिक्षक हों । लेकिन अगर किसी को फुटबॉल में मिल गया हो तो वह इतिहास या कोई अन्य विषय पढ़ाने में क्या योगदान करेगा ?

इस तरह हमने देखा कि नेट/जेआरएफ को किनारे कर नाना प्रकार के मापदंड किस तरह के लोगों को विशेष रूप से लाभ पहुंचाने के लिए बनाये गये हैं !अब मैं अपना मापदंड रखना चाहूँगा ।

किसी भी पद की चयन-प्रक्रिया के लिए मापदंड बनाने के लिए यह देखना जरूरी होता है कि उस पद से अपेक्षाएं क्या है ? यानी हमें कैसा प्रोफेसर चाहिए ? जैसा प्रोफेसर चाहिए उसी के अनुरूप प्रक्रिया बनानी पड़ेगी

मेरे अनुसार एक प्रोफेसर से निम्नलिखित अपेक्षाएं होती हैं —

(1)उन्हें अपने विषय में सामान्य ज्ञान के साथ किसी विशेष विधा का गहन ज्ञान हो ।

(2)उस ज्ञान को बोलकर और लिखकर स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त करने की क्षमता हो । अगर वह शिक्षक भाषा और साहित्य का है तो भाषा के चारों अंगों (श्रवण, भाषण, वाचन और लेखन) में निपुणता रहे ।

(3) उनमें विद्यार्थियों को प्रेरित करने की विलक्षण क्षमता हो । उनके क्लास में प्रवेश करते ही विद्यार्थियों में उत्साह की तरंगें उठने लगे ।

(4) वे अतिशय ज्ञान-पिपासु हों । शोध और अनुसंधान करने-करवाने में उनकी गहरी रुचि हो ।

(5)अपने कर्म के प्रति निष्ठावान हों और कार्य में उन्हें विशेष आनंद का अनुभव होता हो !

(6) अपने विषय के अतिरिक्त जीवन से जुड़े अन्य विषयों का भी एक सामान्य ज्ञान उनके पास हो । जीवन की विविध समस्याओं के प्रति एक सामान्य जागरूकता उनमें होनी चाहिए ।

उपर्युक्त प्रकार के शिक्षकों के चयन के लिए तीन प्रकार की परीक्षाओं की व्यवस्था अपेक्षित है —

क. लिखित परीक्षा — 300 अंक
ख. साक्षात्कार —– 100 अंक
ग. शिक्षण-कौशल-प्रदर्शन 200 अंक

                      (क) लिखित परीक्षा

इसमें तीन पत्र होंगे । प्रत्येक पत्र 100 अंकों का होगा ।

(1). प्रथम पत्र में सामान्य ज्ञान और सामान्य जागरुकता से संबंधित वर्णनात्मक प्रश्न होंगे ।
प्रश्नों की रूपरेखा परंपरागत सामान्य ज्ञान की परीक्षाओं से भिन्न होगी । बाद में इसका प्रारूप बनाया जायेगा ।

(2) दूसरे पत्र में अभ्यर्थियों के विषय से संबंधित वस्तुनिष्ठ प्रश्न होंगे । इसका उद्देश्य उनके विषय- ज्ञान की व्यापकता का परीक्षण होगा ।

(3) तीसरे पत्र में अभ्यर्थियों द्वारा चयनित विधा विशेष के गहन ज्ञान की परीक्षा होगी । जैसे, अगर किसी ने तुलसीदास को गहन ज्ञान के लिए चुना है तो सारे प्रश्न उसी से संबंधित होंगे ।

इन परीक्षाओं के आधार पर एक मेधा सूची तैयार की जायेगी जो विज्ञापित पद संख्या से पांच गुना अधिक होगी । इन्हें अब साक्षात्कार से गुजरना होगा ।

                 (ख) साक्षात्कार

परंपरागत साक्षात्कार से यह अलग होगा । इसमें उस तरह के प्रश्न नहीं पूछे जायेंगे, जिस तरह के लिखित परीक्षा में पूछे जाते हैं । नये ढंग के प्रश्नों का प्रारूप कुछ इस प्रकार का होगा।

(1). इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य किसी विषय पर अभ्यर्थी के समक्ष या तो तीन-चार मिनट का व्याख्यान देंगे या उतनी ही देर तक विषय से संबंधित कोई अंश पढ़कर सुनायेंगे । उसके बाद अभ्यर्थी से कहा जायेगा कि आपने जो भी समझा है, उसे अपने शब्दों में अभिव्यक्त करें । इससे अभ्यर्थी के निम्नलिखित गुणों का परीक्षण होगा —

(अ)उन्होंने उस गद्यांश को कितना समझा है !
(आ) उनकी अभिव्यक्ति शैली कैसी है !
(इ)उच्चारण कैसा है इत्यादि ।

(2) अभ्यर्थियों के शैक्षणिक जीवन से संबंधित सवाल किये जायेंगे । जैसे -पढ़ने-लिखने की तैयारी आप किस तरह करते रहे ? उसमें किस तरह की बाधाएं आयीं ? आपने उन्हें कैसे दूर कीं ? किस तरह के शिक्षकों को आपने पसंद किया ? उनके किन गुणों ने आपको आकृष्ट किया ? आप किस तरह पढ़ाना चाहेंगे और क्यों ? शिक्षण के क्षेत्र में क्या आपने कोई प्रयोग भी किया है ? इत्यादि ।

(3) साहित्य के विद्यार्थियों को कुछ पढ़ने के लिए दिया जायेगा, जिससे पता चलेगा कि भावानुरूप वे शुद्ध-शुद्ध पढ़ सकते हैं या नहीं ? उन्हें बारी-बारी से हिंदी खड़ी बोली का गद्य-पद्य, अवधी, ब्रजभाषा, मैथिली और अपभ्रंश की कविताएं पढ़ने दी जायेंगी ।
इस तरह साक्षात्कार से छांटकर तीन गुना सदस्य शिक्षण-कौशल-प्रदर्शन के लिए चुने जायेंगे ।

                 (ग) शिक्षण-कौशल-प्रदर्शन

प्रोफेसरों की वास्तविक परीक्षा यहीं होती है । अफसोस कि कहीं भी इस तरह का परीक्षण नहीं होता है ।

यह परीक्षा दो सौ अंकों की होगी । 100 के परीक्षक विद्यार्थी होंगे और 100 के विशेषज्ञ ।निर्धारित कॉलेज/विभागों में अभ्यर्थी एक दो दिन कक्षा लेने के बाद यह तय करेंगे कि किस कक्षा में वे कौन सा विषय पढ़ायेंगे और उन्हें कितने दिनों में समाप्त करेंगे ? इसका लिखित विवरण वे विद्यार्थियों और विशेषज्ञों को दे देंगे । विद्यार्थी जो भी अंक शिक्षकों को देंगे उसका कारण भी बतायेंगे ।

विशेषज्ञों को परीक्षण के लिए अपनी सुविधा के अनुसार अभ्यर्थी ही प्रत्येक कक्षा में कम से कम एक दिन आमंत्रित करेंगे । विशेषज्ञ भी अंक का कारण बतायेंगे ।

औसत प्राप्तांक निकालने के बाद मेधा-सूची तैयार होगी । प्रथम आने वाले ज्वायन करेंगे । यह सूची सालभर तक वैध रहेगी । शिक्षण का जो नमूना पेश किया गया है, उसे बरकरार रखना पड़ेगा । सालाना शिक्षण की समीक्षा होगी । उसी के आधार पर वेतन बढ़ेगा । घट भी सकता है और स्थिर भी रह सकता है ।

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