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भ्रम में क्यों पड़े हो?

Byadmin

Aug 12, 2021

*भ्रम में क्यों पड़े हो?*
इस वर्तमान घर-द्वार, पुत्र-कन्या, भाई-बहन, माता-पिता, पति-पत्नीको अपने मानते हो- तुम्हारा यह भ्रम ही है। इस जन्मके पहले जन्ममें भी तुम कहीं थे। वहाँ भी तुम्हारे घर-द्वार, सगे-सम्बन्धी- सब थे। कभी पशु, कभी पक्षी, कभी देवता, कभी राक्षस और कभी मनुष्य- न जाने कितने रूपोंमें तुम संसारमें खेले हो; परंतु वे पुराने- पहले जन्मोंके घर-द्वार, साथी-संगी, स्वजन-आत्मीय अब कहाँ हैं ? उन्हें जानते भी हो ? कभी उनके लिये चिन्ता भी करते हो ? तुम जिनके बहुत अपने थे, बड़े प्यारे थे, उनको धोखा देकर खेलके बीचमें ही उन्हें छोड़ आये; वे रोते ही रह गये और अब तुम उन्हें भूल ही गये हो। उस समय तुम भी आजकी तरह ही उन्हें प्यार करते थे, उन्हें छोड़नेमें तुम्हें भी कष्ट हुआ था; परंतु जैसे आज तुम उन्हें भूल गये हो, वैसे ही वे भी नये खेलमें लगकर, नये घर-द्वार, संगी-साथी पाकर तुम्हें भूल गये होंगे। यही होता है। फिर तुम इस भ्रममें क्यों पड़े हो कि इस संसारके घर-द्वार, इसके सगे-सम्बन्धी, यह शरीर, सब मेरे हैं ?

*सबमें भगवद्धाव करें*
सदा सर्वदा भगवान् का स्मरण बना रहे, इसलिये समस्त कार्य भगवत्सेवाके भावसे करने चाहिये तथा सब भूत प्राणियोंमें भगवद्भाव करना चाहिये और सबको मन-ही-मन प्रणाम करना चाहिये। यह बहुत ही श्रेष्ठ साधन है। जिससे भी हमारा व्यवहार पड़े, उसीमें भगवद्भाव करें। न्यायाधीश समझे कि अपराधीके रूपमें भगवान् ही मेरे सामने खड़े हैं। उन्हें मन-ही-मन प्रणाम करे और उनसे मन-ही-मन कहे कि ‘इस समय आपका स्वाँग अपराधीका है और मेरा न्यायाधीशका। आपके आदेशके पालनार्थ मैं न्याय करूँगा और न्यायानुसार आवश्यक होनेपर दण्ड भी दूंगा। पर प्रभो ! न्याय करते समय भी मैं यह न भूलूँ कि इस रूपमें आप ही मेरे सामने हैं और आपके प्रीत्यर्थ ही मैं आपकी सेवाके लिये अपने स्वाँगके अनुसार कार्य कर रहा हूँ।’ इसी प्रकार एक भंगिन माता सामने आ जाय तो उसको भगवान् समझकर मन-ही-मन प्रणाम करे और स्वाँगके अनुसार बर्ताव करे। यों ही वकील मुअक्किलको, दूकानदार ग्राहकको, डॉक्टर रोगीको, नौकर मालिकको, पत्नी पतिको, पुत्र पिताको और अपराधी न्यायाधीशको, भंगिन उच्चवर्णके लोगोंको भगवान् समझकर व्यवहार करे- बर्ताव करे स्वाँगके अनुसार, पर मनमें भगवद्भाव रखे, तो बर्तावके सारे दोष अपने-आप नष्ट हो जायेंगे। अपने-आप सच्ची सेवा बनेगी। भगवान् की नित्य-स्मृति बनी रहेगी। यों मनुष्य दिनभर अपने प्रत्येक कार्यके द्वारा भगवान् की पूजा कर सकेगा। भगवान् ने कहा है- ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः। अपने कर्मके द्वारा भगवान् को पूजकर मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है।’

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