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मन क्या है?

Byadmin

Oct 3, 2021

मन क्या है???????

मन मस्तिष्क की उस क्षमता को कहते हैं जो मनुष्य को चिंतन शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय शक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राह्यता, एकाग्रता, व्यवहार, परिज्ञान, इत्यादि में सक्षम बनाती है। सामान्य भाषा में मन शरीर का वह हिस्सा या प्रक्रिया है जो किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने और समझने का कार्य करता है।

मित्रो, मानव मन बड़ा चंचल होता है, मन उसे बड़े ही नाच नचाता है, यह सदा आगे ही आगे भागता रहता है, मन की गति बहुत तीव्र होती है, मनुष्य देखता ही रह जाता है और यह पलक झपकते ही पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर वापिस लौट आता है, इससे पार पाना बहुत ही कठिन होता है, यह चाहे तो मनुष्य को सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचा सकता है और चाहे तो गर्त में ढकेल सकता है।

हमारा यह मन नित नये मूड पर आधारित रहता है, जिसे भी देखो वह यही कहता सुनाई पड़ता है कि मेरा मूड नहीं है, कभी प्रसन्न तो कभी उदास रहता है, कभी-कभी बच्चों की तरह चहकने लगता है, तब ऐसा लगता है मानो इन्सान के पैर जमीन पर ही नहीं पड़ रहे, कभी उदास या मायूस हो जाता है और फिर निराशा के सागर में डूबने-उबरने लगता है, कभी ऐसा उखड़ जाता है कि इन्सान कहने लगता है कि मेरा किसी काम में मन नहीं लग रहा।

ये सब इस मन की अवस्थायें हैं जो समय-समय मनुष्य को अपना रंग दिखाती रहती हैं, ईर्ष्या-द्वेष, हर्ष-विषाद, क्रोध-प्यार, आश्चर्य आदि भावनायें भी इसी मन में निवास करती हैं, ये भाव अपने चरित्र का एक हिस्सा बन जाता हैं, जिस भी भाव की अधिकता समय पर विशेष होती है, उसी के अनुसार मनुष्य व्यवहार करने लगता है, मन को मौजी इसीलिये कहते हैं कि यह अपनी ही धुन में रहता है, मानो इसे किसी से कोई लेना-देना ही नहीं हैं।

संतजन कहते हैं “मन के हारे हार है और मन के जीते जीत” अर्थात यदि मनुष्य अपने मन की बात मानकर, निराश होकर, थक-हारकर बैठ जाए तो असफलता ही उसके हाथ लगेगी, परन्तु यदि मनुष्य अपने मन की निराशा को दरकिनार करके साहसिक कार्य कर जाता है तो कोई ऐसा कारण नहीं कि वह सफलता की सीढ़ियाँ न चढ़ सके, अब यह निर्णय तो हम सबका अपना ही होता है कि वह अपने जीवन को किस ओर ले जाना चाहता है।

मन को हम चमत्कारी कह सकते हैं, भाषा की दृष्टि से यदि मन के बाद न शब्द जोड़ दिया जाये तो एक नया शब्द मनन बन जाता है, इसके विपरीत यदि मन से पूर्व न शब्द को जोड़ा जाए तो नया शब्द नमन हो जाता है, मनुष्य यदि अपने जीवन में यथायोग्य प्रणाम अथवा नमन करे और मनन करने का अभ्यास कर ले तो निस्संदेह उसका यह जीवन सार्थक हो जायेगा।

यह मन हमारे शरीर रूपी रथ की लगाम है, इस लगाम को अनुशासन में रखना बहुत आवश्यक होता है, इस पर विवेक या बुद्धि का नियन्त्रण होना चाहियें, यदि लगाम न कसी जाये तो इन्द्रियाँ रूपी घोडे यहाँ वहाँ भागने लगते हैं, यदि वह इसे चलाने में कोताही करेगा तो मानव शरीर में बैठा यात्री आत्मा अपने गन्तव्य यानी मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता, हमारा यह मन आकर्षक और लुभावने रास्तों पर चलकर बड़ा खुश रहता है, उसे शार्टकट भाते हैं, चाहे आगे जाकर उस गलती का कितना ही भयंकर परिणाम क्यों न हो।

इस मन का क्या? वह तो अपने बचाव में सौ बहाने गढ़ लेगा और स्वयं को सन्तुष्ट कर लेगा, लेकिन वास्तविकता तो यही है कि भुगतना तो मनुष्य को ही पड़ता है, चारों ओर से प्रश्नों की बौछार को उसे ही सहना होता है, यह मन भी सच्चाई और ईमानदारी की कठिन डगर पर चलने के लिए मनुष्य को हमेशा हतोत्साहित करता है, हालाँकि यह मार्ग कठिन भी होता है और लम्बा भी होता है पर इस पर चलने से हमेशा शुभ ही होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य को सफलता इसी राह पर चलकर मिलती है।

मन के कहने पर यदि मनुष्य चलने लगें तो अनेकों परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है, इसलिये भाई-बहनों! उन्नति अथवा सफलता की कामना करने वाले लोगों को मन के अनुसार चलने के बजाय अपने तरीके से उसे चलाना चाहिये, मन को यत्नपूर्वक साधकर अपनी मर्जी से चलाना ही श्रेयस्कर होता है, इससे मनुष्य का जीवन भटकाव से बचा रहता है।

जय श्री हरि!
हरि ओऊम् तत्सत्
ओऊम् नम: शिवाय्

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