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मानवजाति के इतिहास में पंथ, धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए इतनी कम अवधि में बलिदानों की ऐसे कड़ी

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Dec 5, 2020

गुरु अर्जुन देव जी :-

पंचम गुरु अर्जुन देव जी के बारे में इतिहास में यह आता है कि विद्रोही शहज़ादे ख़ुसरो को शरण देने के आरोप में जहाँगीर ने उनकी सारी संपत्ति जप्त कर उन्हें उम्र निर्ममता पूर्वक मौत के घाट उतारने का हुक्म दिया था पर उनके ऊपर जहाँगीर की नाराज़गी की एक वजह ये भी थी कि उसे जब पता चला कि गुरु महाराज आदिग्रंथ का संपादन कर रहे हैं तो उसने उन पर ये दबाब डलवाया कि आदिग्रंथ में नबी के लिए लिखी गई ना’अत भी शामिल की जाये, पर गुरु महाराज ने साफ़ इंकार कर दिया।

इन दोनों आदेशों को मानने से साफ़ इंकार करने के बाद जहाँगीर के हुक्म पर उन्हें तपती रेत पर डालने और गर्म कड़ाही पर बिठा कर ऊपर से गर्म पानी डालने की सजा दी गई। इस क्रूर सजा के बाद गुरूजी एक दिन सैनिकों की निगरानी में रावी नदी में स्नान करने गए और वहीं गुरूजी ने जल समाधि ले ली।

गुरु हरगोविंद जी :-

ये अर्जुन देव जी के पुत्र और हमारे छठे गुरु थे। इन पर भी जहाँगीर ने जंगल कानून का उल्लंघन करने, सरकारी धन का दुरूपयोग करने और गुरु अर्जुन देव जी के ऊपर लगाये गए 2 लाख रूपए जुर्माने की रकम न वसूल करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया और वर्षों तक ग्वालियर के किले में अल्पाहार पर नज़रबंद रखा।

गुरु हरराय जी :-

ये गुरु हरगोविंद जी के पौत्र थे, इन्होने दारा शिकोह की मदद की और इसके बाद गुरूजी के पुत्र रामराय जी को हिरासत में ले लिया गया।

गुरु तेगबहादुर जी :-

गुरु तेगबहादुर जी का औरंगजेब के हुक्म पर बड़े अमानुषिक ढंग से सर धड़ से जुदा किया गया।

भाई दयाला जी :-

ये वो वीर थे जिन्हें नवम गुरु अपने साथ रखते थे। भाई दयाला जी को गुरु तेगबहादुर जी की मौजूदगी में एक बड़ी देग, जो पानी से भरी थी, में बैठाया गया और देग के नीचे आग लगा दी गई उबलते पानी में दयाला जी की बलिदान हुआ।

भाई सतीदास जी :-

भाई सतीदास भी नवम गुरु के शिष्य थे, उनके शरीर पर रुई लपेटकर आग लगा दी गयी, क्योंकि उन्होंने भी धर्म त्याग करने से इनकार कर दिया था।

भाई मतीदास जी :-

भाई सतीदास जी भी नवम गुरु के शिष्य थे, उनके शरीर को आरे से बीचोबीच दो भाग में काटकर अलग कर दिया गया था, अपराध वही कि इन्होने भी धर्म त्याग करने से इनकार कर दिया था।

श्री अजीत सिंह जी –

ये गुरु गोविंद सिंह जी के बड़े पुत्र थे, जिनकी उम्र केवल 17 साल थी। 22 दिसंबर सन्‌ 1704 को सिरसा नदी के किनारे चमकौर नामक जगह पर सिक्खों और मुग़लों के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया जो इतिहास में “चमकौर का युद्ध” नाम से प्रसिद्ध है। इस युद्ध में सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के नेतृत्व में 40 सिक्खों का सामना वजीर खान के नेतृत्व वाले लाखों मुग़ल सैनिकों से हुआ था। इस युद्ध में दशम गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्र अजीत सिंह ने अविस्मरणीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए अपना बलिदान दिया था।

श्री जुझार सिंह जी-

ये गुरु गोविंद सिंह जी के छोटे पुत्र थी, जिनकी उम्र केवल 14 साल थी। बड़े भाई श्री अजित सिंह के बलिदान के बाद उसी युद्ध में ये भी वीरगति को प्राप्त हुए थे।

श्री जोरावर सिंह जी-

ये गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्र थे, जिनकी उम्र केवल 7 साल थी। अपनी दादी तथा छोटे भाई के साथ इन्हें सरहिंद के नबाब ने कैद करके एक किले में तब रखा था जब दिसंबर की सर्द रात थी। रात भर ठंड में ठिठुरने के बाद सुबह होते ही दोनों भाइयों को वजीर खां के सामने पेश किया गया, जहां भरी सभा में उन्हें अपना धर्म छोड़ने को कहा गया। जिसे सुनने के बाद दोनों ने ज़ोर से जयकारा लगाया “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल”। दोनों को जिंदा दीवारों में चुनवाने का ऐलान किया गया और इस तरह उनका बलिदान हुआ।

श्री फ़तेह सिंह जी-

ये गुरु गोविंद सिंह जी के सबसे छोटे पुत्र थे, जिनकी उम्र केवल 5 साल थी। अपनी दादी, बड़े भाई के साथ इन्हें सरहिंद के नबाब ने कैद करके एक किले में तब रखा था जब दिसंबर की सर्द रात थी। बाद में इन्हें भी इनके बड़े भाई जोरावर सिंह जी के साथ जिंदा दीवारों में चुनवा दिया गया।

माता गुजरी देवी जी-

माता गुजरी नवम गुरु की धर्मपत्नी थी, जिन्होंने संतप्त समाज की रक्षा के लिए अपने पति गुरु तेग बहादुर जी को भेजा था। ये गुरु गोविंद सिंह जी की माता थीं और अपने दो छोटे पोते श्री जोरावर सिंह जी तथा श्रीफ़तेह सिंह जी के साथ इन्हें भी सरहिंद के किले में कैद किया गया था।

अपने दोनों मासूम पौत्रों का बलिदान देखने के बाद इस शोक में माता गुजरी चल बसीं थीं।

दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी-

एक शाम पाठ करने के बाद जब दशम गुरु विश्राम करने जा रहे थे तब दो पठान धोखे से उनके कक्ष में घुस आये, जिनमें से एक जमशेद उर्फ़गुल खान नाम के पठान ने धोखे से गुरु महाराज जी को छुरा मार दिया जिससे आपका शरीरांत हो गया।

बाबा बंदा सिंह बहादुर :-

1716 में इन्हें 470 साथियों के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया और लोहे के पिंजरे में कैद कर दिल्ली लाया गया, फिर उन्हें अपने हाथों अपने पुत्र का वध करने पर विवश किया गया और उनका मांस चिमटे से नोंच-नोंच कर उनका मार दिया गया तथा उनके सारे साथियों को मौत के घाट उतार दिया गया।

भाई मणिसिंह जी :-

भाई मणिसिंह जी हरिमंदिर साहब के तीसरे ग्रंथी थे, गुरु गोविंद सिंह ने जब गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ तैयार की तो उसका लेखन कार्य भाई मणिसिंह जी ने ही तैयार की थी और रागों के अनुसार उसे व्यवस्थित किया था। इन्होने जब मुगलों से जब अपने त्यौहार मनाने की अनुमति माँगी तो उसने इसे आधार बनाकर लाहौर में टुकड़े-टुकड़े में कटवाकर उनकी हत्या करवा दी।

भाई महताब सिंह :-

ये जयपुर के रहने वाले थे, पवित्र हरमंदिर साहब को दूषित करने वाले क्रूर मस्सा खान रंगड़ का वध करने वाले भाई महताब सिंह जी को ईसवी सन 1745 में चरखी में बाँध कर निर्दयता से मार डाला गया।

भाई तारा सिंह :-

ये एक किसान थे और अपनी ऊपज का एक बड़ा अंश सिखों को लंगर हेतु भेंट किया करता है, यही बात मुगल दरबार को पसंद न आई और इनको भी धर्म छोड़ने को कहा गया, जिससे इनकार के बाद इनका सर काट लिया गया।

वीर हकीकत राय:-

ये सहजधारी सिख थे और मदरसे में हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किये जाने से आहत होकर इन्होंने विरोध कर दिया और इस अपराध (?) में क्रूरता से इनकी हत्या की गई

तारू सिंह जी :-

पंजाब के माझा क्षेत्र के जाट युवक थे, उनको लाहौर के सूबेदार जकारिया खान ने अंतहीन यातनाएं दी और उन्होंने कष्टों के बीच जपजी साहब का जप करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

बाबा दीप सिंह जी :-

बाबा दीप सिंह जी गुरु गोविंद सिंह जी के समय सिख बने थे, 1757 में अहमद शाह अब्दाली का सेनापति जहान खान फौज के साथ हरिमंदिर साहिब को तबाह करने के लिए अमृतसर पहुँचा तो उस समय बाबा दीप सिंह दमदमा साहिब में थे। जब उन्हें इस हमले के बारे में जानकारी मिली, तो उन्होंने फौरन सेना के साथ अमृतसर की ओर कूच किया, इस युद्ध के समय उनकी उम्र 75 साल थी। युद्ध में बाबा दीप सिंह मुगल कमांडर जमाल खान बाबा के बीच युद्ध हुआ, जिसमें बाबा दीपसिंह जी का बलिदान हुआ। कहा जाता है कि बलिदान के बाद बाबा दीप सिंह जी ने अपने हाथ में अपना कटा सर लेकर दरबार साहिब की परिक्रमा की थी।

हरिसिंह नलवा जी-

ये महाराजा रणजीत सिंह जी के सेनापति थे और उनके शासन के दौरान 1807 ई. से लेकर 1837 ई. तक वो लगातार अफगानों के खिलाफ लड़े। अफगानों के खिलाफ जटिल लड़ाई जीतकर नलवा ने कसूर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर. 1837 में भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा को बचाते हुए इनका बलिदान हुआ।

सतगुरु रामसिंह कूका :-

बाबा रामसिंह कूका भारत की आजादी के सर्वप्रथम प्रणेता (कूका विद्रोह), असहयोग आन्दोलन और स्वदेशी आन्दोलन के मुखिया, सिखों के नामधारी पंथ के संस्थापक, तथा महान समाज-सुधारक थे। गो-रक्षा के लिए इनके शिष्यों का बलिदान हुआ और इन्हें क़ैद करके बर्मा के जेल में भेज दिया गया।

मानवजाति के इतिहास में पंथ, धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए इतनी कम अवधि में बलिदानों की ऐसे कड़ी में जुड़ने का गौरव पंजाब के अलावा कहीं और अंकित नहीं है। ऊपर जो नाम आये हैं, वो तो व्यक्तिगत बलिदानों के हैं, इसके अलावा चाहे वो बाबा बंदा सिंह जी के साथी हों या बाबा दीप सिंह जी के, या फिर हरिसिंह नलवा या कूका आंदोलन के गोभक्त, उनको मिला दें तो ये कड़ी और लंबी तथा अंतहीन हो जायेगी। बलिदानियों में एक बड़ी कड़ी महिलाओं की भी है, जिनके पुण्य-स्मरण के बिना ये सूची पूरी ही नहीं होती।

उपरोक्त नामों के स्मरण के एकमात्र हेतु ये स्मरण कराना है कि पंजाब को अगर पाथेय ग्रहण करना है तो इनसे करें, जो पूरे देश के लिए पाथेय हैं न कि केवल उनके लिए।

और देश का कर्तव्य है कि वो इन नामों का स्मरण कर इनके बलिदानों से कुछ सीख ग्रहण करे।

और किसान की आड़ में देश विरोधी लोगों का हथियार बन जाने वालों को याद दिलाने के लिए है कि ज़ख्म कितने गहरे हैं, जिसे आप भूल चुके हो।

संवाददाता

निहारिका

गुजरात

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