• Sat. Jun 25th, 2022

:-: मानव :-:
इस संसार में 84 लाख प्रकार के जीव हैं और सबके अपने अपने गुण और अवगुण हैं, कोई छोटा हैं ,तो कोई बड़ा,कोई सुरीला हैं तो कोई बेसुरा।धरतीं को छोड़कर जो अन्य लोक हैं, वहाँ जीव में जिस प्रकार के भाव की अधिकता होने पर,वो वहाँ जिस प्रकार के कर्म करता हैं, उसे उन कर्मो के अनुरूप ही धरती पर जीवन मिलता हैं।यहीं कारण है कि मनुष्य को छोड़कर ,अन्य सभी प्रकार के जीवों में कोई एक न एक विशेष गुण या अवगुण होता हैं,जो उनके स्वभाव पर हावी होता हैं और अन्य भाव सुप्त अवस्था में होने के कारण वो अपने प्राकृतिक स्वभाव को बदल नहीं पाते, जैसे मछली अच्छा तैरती हैं, तो घोड़ा अच्छा भागता है,लेकिन धरतीं पर मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव हैं जिसमें सभी प्रकार के रसों और भावों का समावेश होता हैं और वह अपनी इच्छानुसार इन भावों का उपयोग कर सकता हैं।मनुष्य जीवन में रहकर अगर मनुष्य अच्छे भाव वाला कर्म करें,तो मरने के बाद उसे ,उसे उसी प्रकार के भाव वाले लोक में रहने का मौका मिलता हैं और वहाँ जैसे रहता हैं, वैसा जीवन धरतीं पर मिलता हैं, मतलब दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।यह चक्र अनंत काल तक इसी प्रकार चलता रहता हैं,अतः मनुष्य योनि में मानव बनकर ही व्यवहार करें,दानव नहीं।
धन्यवाद :- बदला नहीं बदलाव चाहिए

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