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मुंशी प्रेमचंद

Byadmin

Jul 30, 2021

मुंशी प्रेमचंद
इकतीस जुलाई सन1880 में एक सितारा धरा पर आया,
शिव की नगरी वाराणसी के निकट लमही गाँव था अपनाया।

ग़रीब पिता अजायब राय और माता आनन्दीदेवी हुए हर्षित
घरकाकोना कोना हुआ गुंजायमानआशा भरी किरणोंसे हो सिंचित।

था ग़रीबी का पहरा घर पर फिर भी नाम मिला धनपतराय,
शैशवावस्था बीती कष्ट में, न था घर में धन- दौलत का साया।

सात सावन ही बीते थे ,नियति ने भी खेला खेल क्रूरता से
थी दुनिया की सबसे बड़ी दौलत माँ, छीन लिया उसे निर्ममता से।

सात साल की अवस्था में ही ये कैसा वज्रपात हुआ,
आई विमाता घर में जिसने न जाने कैसा बर्ताव किया।

बचपन घिर गया चुनौतियों से असमय ही जो छिन गया,
माँ की लोरी की यादों में ही पल-पल न जाने कैसे गुजर गया।

विमाता के आते ही घर में दो नन्हें सदस्यों का आगमन हुआ,
धनपतराय की बढ़ी जिम्मेदारियाँ और नवाबराय उपनाम हुआ।

रहे सदा ही प्रेम से वंचित स्नेह के बदले काँटों का हार मिला,
न मिला पेट भर भोजन न तन ढकने को वस्त्र मिला।

कम उम्र में ही गृहस्थ आश्रम की कड़ी भी जुड़ गई,
अर्धांगिनी के रूप में प्रिय शिवरानी देवी मिल गई।

हाय रे क्रूर नियति !चौदह दीवाली भी न बिताने दी,
छीना था माँ का साया अब पिता के साए से भी वंचित कर दिया।

टूट पड़ा पहाड़ मुसीबतों का हुआ पिता का असमय देहावसान ,
अकेले ही अब पाँच जनों के भरणपोषण का रखना था ध्यान

चौदह वर्ष का बालक असमय ही प्रौढ़ हो गया,
कंपकंपाती ठंड में भी सबका पेट भरने कोट अपना बेच दिया।

था जिन किताबों से अपने से भी अधिक लगाव,
जिम्मेदारियों के आगे हो मज़बूर उन्हें भी दाँव पर लगा दिया।

है नमन ऐसे व्यक्तित्व को इतनी चुनौतियों में भी जिसने,
हिंदी को पाला पोसा बड़ा किया और नया संस्कार दिया।

मित्रों के लिए जिसके दिल में सदा ही प्रेम भाव पलता रहा,
ग़रीबों और पीड़ितों के लिए हृदय सदा करुणा छलकाता रहा।

रचनाओं में इंसान की घुटन-चुभन, कसक प्रतिबिंबित होता रहा,
दलित समाज,स्त्री दशा,समाज में व्याप्त विसंगतियों पर ध्यान रहा

ऐसे ओजस्वी ,बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व मुंशी प्रेमचंद को,
आधुनिक काल के कथा सम्राट की उपाधि से नवाजा गया।

धन्य है भारतमाता जिसने ऐसे लाल को जन्म दिया,
आओ मिलकर करें श्रद्धांजलि अर्पित ऐसे दिव्य व्यक्तित्व को

लें प्रेरणा ऐसे कर्मठता के पुजारी से, हों हौसले बुलंद तो,
कठिनाइयों से जूझ सकते हैं हम, रच सकते हैं इतिहास नया।
” ख्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की,
आप मुझे जानते हो इतना ही काफ़ी है।”
“जीत जाओ तो कई अपने पीछे छूट जाते हैं,
हार जाओ तो अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं।”
मुंशी प्रेमचंद।

माधुरी भट्ट

संपादक

सी बी मणि त्रिपाठी

बलरामपुर

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