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मौत की भी मौत

Byadmin

Jul 19, 2021

मौत की भी मौत
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जो ईश्वर का भक्त होता है, उसका स्वामी ईश्वर होता है। उस पर मौत का अधिकार नहीं होता। अनधिकार चेष्टा करने से मौत की भी मौत हो जाती है।
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गोदावरी के तट पर ‘श्वेत’ नामक एक ब्राह्मण रहते थे। उनका सब समय निरंतर साम्ब सदाशिव की पूजा में व्यतीत होता था।
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वे अतिथियों को शिव समझकर उनका भली भांति आदर – सत्कार किया करते थे। उनका शेष समय भगवान के ध्यान में बीतता था।
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उनकी आयु पूरी हो चुकी थी, किंतु उन्हें इस बात का ज्ञान न था।
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उन्हें न रोग था न शोक, इसलिए आयु पूरी हो चुकी है, इसका आभास नहीं हुआ।उनका सारा ध्यान शिव में केंद्रित था।
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यमदूत समय से उन्हें लेने आएं, परंतु वे उनके घर में प्रवेश नहीं कर पाते थे।
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चित्रगुप्त ने मृत्यु से पूछा – मृत्युदेव ! श्वेत अब तक यहां क्यों नहीं आया ? तुम्हारे दूत भी नहीं आएं।
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यह सुनकर मृत्यु को श्वेत पर बहुत क्रोध आया। वे स्वयं उन्हें लेने दौड़े।
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गृह के द्वार पर यमदूत भय से कांपते दिखायी पड़े।
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उन्होंने मृत्यु से कहा – नाथ ! हम क्या करें ? श्वेत तो शिव द्वारा सुरक्षित है।
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उसे तो हम देख भी नहीं पा रहे हैं, उसके पास पहुंचना तो अत्यंत कठिन है ।
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दूतों की बात सुनकर मौत का क्रोध और भभक उठा। वे झट ब्राह्मण के घर में प्रवेश कर गए। ब्राह्मण देवता को यह पता न था कि कहां क्या हो रहा है ?
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मृत्युदेव को झपटते देखकर भैरव बाबा ने कहा – मृत्युदेव ! आप लौट जाइये। किंतु मृत्युदेव ने उनकी बात को अनसुनी कर श्वेत पर फंदा डाल दिया।
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भक्त पर मृत्यु का यह आक्रमण भैरव बाबा को सहन न हुआ। उन्होंने मृत्यु पर डंडे से प्रहार किया। मृत्युदेव वहीं ठंड हो गए।
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यमदूत भागकर यमराज के पास पहुंचे। वे डर के मारे थर – थर कांप रहे थे। मृत्यु की मृत्यु सुनकर यमराज को बड़ा क्रोध हो आया।
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उन्होंने हाथ में यमदण्ड ले लिया और अपनी सेना के साथ श्वेत के पास पहुंच गए।
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वहां भगवान शंकर के पार्षद पहले से ही खड़े थे। सेनापति कार्तिकेय के शक्ति अस्त्र से सेना सहित यमराज की भी मृत्यु हो गयी।
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यह अपूर्व समाचार सुनकर भगवान सूर्य देवताओं के साथ ब्रह्मा के पास पहुंचे और ब्रह्मा सबके साथ घटनास्थल पर आये।
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देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की और कहा – भगवान ! यमराज सूर्य के पुत्र हैं।
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ये लोकपाल हैं। इन्होंने कोई अपराध या पाप नहीं किया है, अत: इनका वध नहीं होना चाहिए। इन्हें जीवित कर दें, नहीं तो अव्यवस्था हो जायगी।
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भगवन ! आप से की हुई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती।
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भगवान आशुतोष ने कहा – मैं भी व्यवस्था के पक्ष में हूं।
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वेद की एक व्यवस्था है कि जो मेरे अथवा भगवान विष्णु के भक्त हैं, उनके स्वामी स्वयं हम लोग होते हैं। मृत्यु का उन पर कोई अधिकार नहीं होता।
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यमराज के लिए यह व्यवस्था की गयी है कि वे भक्तों को अनुचरों के साथ प्रणाम करें।
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इसके बाद भगवान आशुतोष ने नंदी के द्वारा गौतमी गंगा (गोदावरी) का जल मरे हुए लोगों पर छिड़कवाया। तत्क्षण सब के सब स्वस्थ होकर उठ खड़े हुए।

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