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यज्ञ

Byadmin

Mar 4, 2021

.यज्ञ ……..

वेद काल अद्भुत है…. लेकिन फिर भी वैदिक यज्ञों में हिंसा हुई है….. अश्व को काटकर पूरा ?….

एक चींटी तक नहीं मारनी चाहिए…. बलि में अन्य पशु तो चढ़ते हैं लेकिन हमारे यहां तो नरमेध तक के यज्ञ हुए हैं …..आदमी को काट दिया ?….यह कैसी धार्मिकता थी ?…..
मैं वेद की परंपरा में नहा कर निकली हुई नही हूं लेकिन फिर भी जो अच्छा नहीं लगा ….वो अच्छा नहीं लगा ….और वो मैं कहूंगी……

तुलसी कहते हैं कि यज्ञ की परंपरा काम का मैं निषेध ना करूं….. परंतु मैं यज्ञ की दिशा बदलूंगा….. यज्ञ में तर्पण करना पड़ता है …..बलि चढ़ानी पड़ती है…. घी डालना पड़े ….समीध डालना पड़े….

तुलसी ने विनय पत्रिका में यज्ञ का रूप बदला…. यज्ञ में तर्पण करने के लिए सबके पास गंगाजल नहीं… यमुना जल नहीं ….तो किससे तर्पण ?….प्रेम के पानी से …आसुओं से तुम तर्पण करना…..

तुलसी कहते हैं तेरी आंखों के आंसू से तर्पण करो…. कलियुग में लोगों के पास रोटी पर लगाने को एक चम्मच घी नहीं होगा…. और तुम बड़े बड़े यज्ञों के लिस्ट दे दो कि इतने किलो घी लगेगा ……ये विधान प्रैक्टिकल नहीं होगा…..
तुलसी कहते हैं तुझे होम में घी डालना हो… तो तेरे स्वाभाविक स्नेह को घी बनाना …

साधक ने तुलसी को पूछा की यज्ञ में तो समीध डालने पड़े…… अष्ट प्रकार के समीध होते हैं… तुलसी कहे कि तेरे मन में बात बात में जो छोटी छोटी बड़ी शंकाएं और संशय पैदा होता है ना …..उस समीध को यज्ञ में जला दो ….

अग्नि तो चाहिए ही…… क्षमा रूपी अग्नि को प्रकटाना …क्षमा से आदमी जलकर भस्मीभूत हो जाता है…. क्षमा की ताकत जैसी तैसी नहीं …..

अब हम क्या करते हैं कि बलि चढ़ाने के स्थान पर एक प्रकार का फल चढ़ाते हैं…. उसमें छेद करते हैं… कुमकुम डालकर उसको लाल रंग करते हैं ….ये सब मन को मनाने के धंधे हैं….. मैं भूदेवों को कहता हूं कि हम ये फल चढ़ाने का भी बंद कर दे तो ?…. उसके बदले एकाद फल हम अर्पण ना करें ?…

क्यूँकी फल काटना वो हिंसा वृति है …..मुझे तो कभी-कभी लगता है कि नारियल फोड़ना ये भी हिंसा वृत्ति है … किसी को फोड़ना इसमें हिंसा ही है…. आपको नहीं लगता है ऐसा धड़ाधड़ जो हम करते हैं ?….मेरे पास कई लोग नारियल लाते हैं ….मैं कहता हूं जाओ बाहर जाकर कहीं फोड़ लो…. यहां मत फोड़ो….

पूरा फल अर्पण कर दो ना…. काटने की क्या जरूरत है ?… उसमें हिंसा वृत्ति है …..कई विद्वान ब्राह्मणों ने कहा कि हमने ये सब बंद ही कर दिया है …..

ये ब्राह्मण देवता ही अगर ऐसे यज्ञ कराने बंद कर दे ना…. तो कोई करेगा ही नहीं…. लेकिन हम ही लिस्ट देते हैं कि ऐसा करना पड़ेगा…. ऐसा करना पड़ेगा …..
यहां से शुरू करो तो कितना फायदा हो…..

बिना हिंसा का यज्ञ कौन सा ?…..एक ऐसा यज्ञ गीता में बताया है …..हे अर्जुन…..तमाम यज्ञों में ….. माला य़ा बेरखा लेकर ….और जब भी समय मिले ….खेतों में काम करने के बाद …मजदूरी करने के बाद…. ऑफिस में काम करने के बाद…. स्कूल अटेंड करने के बाद ….हमारी ड्यूटी पूरी करने के बाद…. ऐसा लगे कि अब कोई काम नहीं….. तब बेरखा या माला लेकर तुम्हारा जो इष्टदेव हो ….तेरा जो परमात्मा हो मुबारक हो…. तुम्हारी जो भी बंदगी हो… वो हरि नाम का जप करो…. भगवान कृष्ण कहते हैं ये यज्ञ है …..इस यज्ञ में कोई हिंसा नहीं….. जप करो ….

शांति रखना ये भी यज्ञ है …. घर में शांति रखना ये भी एक यज्ञ है …..भले हरि का नाम ना लो …माला ना फेरो …. कोई दबाव नहीं…… किसी भी वस्तु का दबाव करना ये भी हिंसा है……अनिवार्य सब वस्तु हिंसा है …..स्वाभाविक सभी वस्तु अहिंसा है ……

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