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यही एक कर्म है, यही एक ज्ञान है, यही एक धर्म है।

Byadmin

May 14, 2021

वृन्दावन में एक बार हितहरिवंश समस्त भारत के दिग्विजयी विद्वान थे। उन्होंने सारी विद्वत्ता को यमुना में फेंककर कर राधा कृष्ण की भक्ति प्रारम्भ की। इसके कुछ ही दिन बाद एक और बहुत बड़े विद्वान, व्यास दिग्विजय करने आये। वो भी महारसिकों में हैं, हितहरिवंश को शास्त्रार्थ के लिये उन्होंने चैलेन्ज किया। लोगों ने कहा-भई अगर एक दिग्विजयी विद्वान है, तो दूसरा अगर बनना चाहता है, उसकी लाइफ में, तो उसको प्रथम दिग्विजयी विद्वान को परास्त करना होगा तब माना जाएगा। वो व्यास वृन्दावन पहुँच गये। हितहरिवंश खाना बना रहे थे। व्यास ने कहा कि आप हितहरिवंश हैं। उन्होंने कहा- जी हाँ, कहिये क्या सेवा करें, भोजन प्रसाद कुछ? नहीं-नहीं, प्रसाद-वसाद नहीं, मैं तो शास्त्रार्थ करने आया था। हितहरिवंश ने कहा कि भई ! शास्त्रार्थ तो उससे किया जाता है जो शास्त्र का अर्थ जानता है। अब तुमसे क्या शास्त्रार्थ करें, तुम शास्त्र का अर्थ जानते ही नहीं हो। वेद-शास्त्र में क्या लिखा है, यह तुम जानते ही नहीं हो, तो तुमसे शास्त्रार्थ क्या करें। अरे! कोई दारा सिंह किसी टी.बी. के मरीज को चैलेंज करता है भला कहीं? अरे भइया, हमारे तो जीने के लाले पड़े हैं, थर्ड स्टेज में हमारी टी. बी. है, आप हमको क्या चैलेंज कर रहे हैं, हम तो एक झापड़ भी न सह सकेंगे। व्यास को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा- आप कैसे कहते हैं कि मैं शास्त्र का अर्थ नहीं जानता। उन्होंने कहा भई देखो! ऐसा है कि तमाम झगड़ाबाजी ठीक नहीं है। हम तो वृन्दावन में राधे राधे राधे करने के लिये हैं। ऐसा करो, तुम जरा कागज-पैन ले आओ। व्यास ने कहा कि कागज और पैन शास्त्रार्थ होगा? अरे! शास्त्रार्थ तो ऐसी वस्तु है कि एक घंटा लगे, एक दिन लगे, एक महीना लगे, एक साल लगे, जीवन बीत जाये और शास्त्रार्थ समाप्त न हो, ऐसा भी सकता है तो लिख-लिखकर शास्त्रार्थ कैसे पूरा होगा? नहीं नहीं, व्यास तुम समझे नहीं। मैं कागज-पैन तुमसे मँगा रहा है इसलिये कि मैं लिखे देता हूँ कि तुम जीत गये, मैं हार गया। तुम भाग जाओ यहाँ से। हमारा यह राधाकृष्ण के चिंतन में तुम डिस्टर्ब न करो, हमारा एक-एक क्षण मूल्यवान है। व्यास आश्चर्यचकित कि यह दिग्विजयी पंडित हो करके बिना शास्त्रार्थ किये, यह कह रहा है कि मैं तुमको लिख देता हूँ कि तुम जीत गये, मैं हार गया। बस भाग जाओ, दिखा देना सबको, सारी इंडिया से लेकर गोलोक तक। तो व्यास जब कुछ नहीं बोले तो हरिवंश ने कहा- देखो बेटा, मैंने तुम्हें कोई अपमानित नहीं किया। मैं तो केवल यह कह रहा हूँ कि अगर तुम शास्त्र का अर्थ जानते तो-

आलोड्य सर्व शास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणो हरिः॥:
(स्कन्द पुराण, लिङ्ग पुराण)

वेदव्यास जिन्होंने वेदों का व्यास किया, वेदान्त बनाया, १८ पुराण बनाये, भगवान् के अवतार भी हैं, उन्होंने कहा- मनुष्यों! तुम्हारी बुद्धि से यह अगम्य है, कि तुम सारे शास्त्र-वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लो। अरे! तुम पढ़ भी नहीं सकते, किताब के पन्ने पलटने में आयु बीत जाएगी, इतना अम्बार है। मैंने सब देखा, सुना, समझा, मंथन किया है इसलिये मैं दोनों हाथ उठाकर कह रहा हूँ- बस भगवान् का ध्यान करो। यही लिखा है शास्त्रों वेदों में और कुछ नहीं लिखा। तो अगर तुम, व्यास, शास्त्र का अर्थ जानते हो, तो तुम दूसरे को अपमानित करके, अपने अहंकार को बढ़ाने का यह बदपरहेजी वाला काम करते? यह तो और तुम नीचे गिरे जा रहे हो। साधारण लोग भी तुमसे उच्च कक्षा में हैं, क्योंकि वह यह नहीं सोच सकते कि मैं दिग्विजयी पंडित हूँ, सारे भारतवर्ष को मैंने जीता है, यह अहंकार तो नहीं है इनमें। व्यास वहीं शरणागत हो गये हित हरिवंश के। ब्रज रसिक लोग जानते हैं। तो शास्त्र वेद जितने भी बने हैं, सबका एक ही कहना है- भक्ति करो, भगवान् से प्रेम करो। एक सूफी फकीर कहता है-

वेद अवस्ता अल् कुरान इंजील नीज़ काबओ बुतख़ानवो आतशक़दा।

अरे। मैंने सब वेद पढ़ा है। दूसरे फकीर ने कहा- अरे। तू मुसलमान है, तू वेद को क्या जाने? अरे! तुम नहीं जानते, सब वेद मैंने पढ़ा है और सब इंजील मैंने पड़ी है और सबको मैंने एडमिट कर लिया है, और मंदिर को भी अपना लिया, मस्जिद को भी अपना लिया, गिरजाघर को भी अपना लिया। क्यों? इसलिये कि मैंने खुदा से प्यार कर लिया, मुहब्बत कर ली। यही तो लिखा है, तुम्हारे वेद में, तुम्हारे पुराण में, तुम्हारे बाइबिल में और क्या लिखा है। हमने जब प्यार कर लिया तो मान लिया। वेद हमसे खुश हो जायगा। हाँ हाँ, इसने हमारी बात समझ ली और मान ली, कुरान भी खुश हो जायगा, कोई नाराज नहीं होगा हमसे। तो शास्त्र वेद का ज्ञान प्राप्त करने का अभिप्राय यह है कि भगवान से प्यार करें। उद्धव बहुत बड़े ज्ञानी थे, आप लोग जानते हैं। भगवान् ने उनसे कहा- क्यों, तुमने ज्ञान प्राप्त कर लिया? हाँ हाँ, क्यों नहीं, कर लिया। सखा थे रुआब में बोलते थे श्रीकृष्ण से। उन्होंने कहा सुनो-

ज्ञान विज्ञान सम्पन्नो भजन मां भक्ति भावतः।
(भाग. ११-१९-५)

तुम ज्ञान विज्ञान से सम्पन्न हो गये ना? हाँ, अब मुझसे प्यार करो। अगर कोई जान ले किसी को कि यह मेरा है, तो फिर प्यार न करे, यह इम्पॉसिबिल है। जैसे मान लो कि कोई बाप बेटे हैं। किसी बाप ने बेटे को झापड़ लगा दिया, किसी गलती पर। बेटा रूठकर बाहर चला गया, छोटी-सी आयु में, कहीं नौकरी-वौकरी होटल वगैरह में करके, फिर कहीं दलाली वलाली करके, फिर उसके बाद विशेष बिजनेस में रुपया वगैरह कमा करके, करोड़पति बन करके लौटा कि अपनी जन्मभूमि में जायें। पहले उसका विचार था कि हम मरने के बाद भी नहीं आयेंगे यहाँ, हमको हमारे बाप ने मारा है। लेकिन विवेक आता है मनुष्य को, सदा अविवेक नहीं रहता। सद्बुद्धि आई, उसने कहा- पिताजी के दर्शन कर आयें। वह भी चला। पिता भी हाफमैड-सा हो गया था, पुत्र के वियोग में। एक ही पुत्र था। एक धर्मशाला में अचानक ऐसा संयोग हुआ उसी में आया, पिता भी उसी में आया। दोनों बगल-बगल के कमरों में ठहर गये। तो चूँकि पिता दुखी था इसलिये अंडबंड बोला करता था, कभी रोवे, कभी कुछ बोले। और बेटा करोड़पति हो गया था और युवावस्था थी, वो बाहर निकल कर डॉंटने लगा- -अरे ओ बुड्ढे ! नींद में डिस्टर्ब करता है। ऐसे पागलों को धर्मशाला में ठहरा देते हैं, लोग। कहाँ है मैनेजर? बुलाओ उसको, इसको निकाल बाहर करें। अस्तु, दोनों में कुछ गर्मागमी भी हुई और यह आउट हो गया कि ये दोनों बाप-बेटे हैं। आउट होते ही वह गुस्सा तो खैर चला ही गया, लिपट कर दोनों रोने लगे। देखिये, जहाँ इतनी दुश्मनी थी, वहाँ जानते ही प्यार हो गया, इमीडिएटली। अगर कोई कहे, मैंने भगवान को जाना है, १० प्रतिशत, तो १० प्रतिशत प्यार हो गया होगा? नहीं, प्यार तो नहीं हुआ, तो तुमने नहीं जाना, सिद्ध हो गया, बकवास करते हो। जानने का मतलब मानना। जानने का मतलब मानना होता है। अगर नहीं माना तो क्या जाना?

दृष्ट्वा जन्म जरा विपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते।
पीत्वा मोहमयीं प्रमाद मदिरामुन्मत्तभूतं जगत्॥

देख रहा है मनुष्य, माँ से क्या मिला? बाप से क्या मिला? बेटे से क्या मिला? बीबी से क्या मिला? पति से क्या मिला? दोस्तों से क्या मिला? सब स्वार्थ का कच्चा चिट्ठा मिला, फिर क्या सोचा? सोचा कुछ नहीं। क्यों? अरे सोचना चाहिये न। तुम मनुष्य हो, ज्ञान प्रधान योनि में बैठे हो, देवदुर्लभ शरीर पाये हो। इसलिए पाये हो? क्या उपयोग कर रहे हो उसका? मृत्युपर्यन्त भी कभी न सोचा, एक क्षण को भी कि ये सब हमारे नहीं हैं। बिल्कुल हमारे नहीं हैं, प्वाइंट वन परसेन्ट भी। इनसे हमारा काम नहीं बनेगा, हमारा स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा और हम स्वार्थ से ही सम्बन्ध रखते हैं। यह हमारा नेचर है। जहाँ-जहाँ आपके मन का अटैचमेन्ट है, केवल स्वार्थ से है। यह भी बहुत डिटेल में आप सुने हैं, समझे हैं। यह एक आश्चर्यजनक घटना है, अनंत जन्मों तक धोखा खाने के बाद भी, हम वहीं जाते हैं और लोक में यह कहावत प्रख्यात है कि बिल्ली यदि एक बार गरम दूध में जल जाये, उसका मुँह, तो छाछ को भी फूँक-फूँककर पीती है। और तुम अनंत बार जल कर भी फिर वहीं जाते हो। अगर कोई कह दे कि श्रीमान् जी! वैसे आप बड़े अच्छे हैं, लेकिन जरा आपका एक स्क्रू ढीला है, केवल एक सिंगल। क्या? क्या कहा आपने? स्क्रू ढीला है? यह लो, कहते ही ढीला हो गया और अधिक। देखो! अरे ! क्रोध आ गया न? क्रोध का मतलब क्या होता है, अपनी हानि। तुम तो स्वार्थी हो न। हो, तो क्रोध करके अपनी हानि क्यों कर रहे हो? अरे, यह कौन समझदारी की बात है। तुम तो स्वार्थी हो। हां, हम तो मतलबी हैं। अरे! चार्वाक मतावलम्बी हो, मान लिया। तो स्वार्थी का मतलब तो यह होता है न, जो अपना नुकसान न करे। हाँ। और तुम तो क्रोध कर रहे हो। शरीर का भी नुकसान होगा, और मैन्टल भी होगा, स्प्रिचुअल भी होगा, सब प्रकार का लॉस कर रहे हो, तुम अपना। हाँ हाँ, क्यों कर रहा हूँ, यह पता नहीं। हमने कुछ डिसीजन नहीं लिया, अभी तक। सुना बहुत, पढ़ा बहुत, सोचा बहुत। खाक़ पढ़ा, खाक़ सुना, खाक़ सोचा। जब निश्चय नहीं है, तो फिर क्या? आपका परिश्रम व्यर्थ है। तो इस प्रकार केवल भगवान् से प्यार करना- यही एक कर्म है, यही एक ज्ञान है, यही एक धर्म है।

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