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वैष्णवो और शैवों का झगड़ा हमेशा रहा है जिसे खत्म करने के लिए शाक्त सम्प्रदाय बनाया गया

Byadmin

Mar 6, 2021

वैष्णवो और शैवों का झगड़ा हमेशा रहा है जिसे खत्म करने के लिए शाक्त सम्प्रदाय बनाया गया

संतों के खूनी संघर्ष की सबसे बड़ी घटना वर्ष 1760 में हरिद्वार कुंभ में संतों के बीच संघर्ष में नागा संन्यासियों ने 1800 वैष्णव संन्यासियों को मार दिया था। अखाड़ों के विवाद खत्म करने के लिए अखाड़ा परिषद् गठित हुआ, जिसकी व्यवस्थाओं को अब सभी अखाड़े मान्यता देते हैं। निर्वाणी अखाड़े और शंभू दल की कभी नहीं बनी।

कथा रक्त संघर्ष की शाही स्नान में अखाड़ों के संघर्ष की आशंका बनी ही रहती है। हरिद्वार में वर्ष 1310 के कुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े और रामानंद वैष्णवों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था।

प्राचीनकाल में देव, नाग, किन्नर, असुर, गंधर्व, भल्ल, वराह, दानव, राक्षस, यक्ष, किरात, वानर, कूर्म, कमठ, कोल, यातुधान, पिशाच, बेताल, चारण आदि जातियां हुआ करती थीं। देव और असुरों के झगड़े के चलते धरती के अधिकतर मानव समूह दो भागों में बंट गए। पहले बृहस्पति और शुक्राचार्य की लड़ाई चली, फिर गुरु वशिष्ठ और विश्‍वामित्र की लड़ाई चली। इन लड़ाइयों के चलते समाज दो भागों में बंटता गया।

हजारों वर्षों तक इनके झगड़े के चलते ही पहले सुर और असुर नाम की दो धाराओं का धर्म प्रकट हुआ, यही आगे चलकर यही वैष्णव और शैव में बदल गए। लेकिन इस बीच वे लोग भी थे, जो वेदों के एकेश्वरवाद को मानते थे और जो ब्रह्मा और उनके पुत्रों की ओर से थे। इसके अलावा अनीश्वरवादी भी थे। कालांतर में वैदिक और चर्वाकवादियों की धारा भी भिन्न-भिन्न नाम और रूप धारण करती रही।

शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के झगड़े के चलते शाक्त धर्म की उत्पत्ति हुई जिसने दोनों ही संप्रदायों में समन्वय का काम किया। इसके पहले अत्रि पुत्र दत्तात्रेय ने तीनों धर्मों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव के धर्म) के समन्वय का कार्य भी किया। बाद में पुराणों और स्मृतियों के आधार पर जीवन-यापन करने वाले लोगों का संप्रदाय ‍बना जिसे स्मार्त संप्रदाय कहते हैं।

इस तरह वेद और पुराणों से उत्पन्न 5 तरह के संप्रदायों माने जा सकते हैं:- 1. वैष्णव, 2. शैव, 3. शाक्त, 4 स्मार्त और 5. वैदिक संप्रदाय। वैष्णव जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं, शैव जो शिव को परमेश्वर ही मानते हैं, शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं और स्मार्त जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं। अंत में वे लोग जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं। हालांकि आजकल सब कुछ होचपोच।

वर्ष 1398 के अर्धकुंभ में तैमूर लंग के आक्रमण से कई जानें गईं। वर्ष 1760 में शैव संन्यासी व वैष्णव बैरागी, तो 1796 के कुंभ में शैव संयासी और निर्मल संप्रदाय भिड़े। 1998 में हर की पौड़ी में अखाड़ों का संघर्ष हुआ।

संसार में सबसे प्राचीन मंदिर और सम्प्रदाय के सबूत जो मिलते है वो शैव और शाक्त ही है सबसे ज्यादा मन्दिर भी शिव और शक्ति के ही है🚩🚩🚩

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