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संसार के दुख पूर्णतया कभी भी नष्ट नहीं होते हैं

Byadmin

Mar 5, 2022

★संसार के दुख पूर्णतया कभी भी नष्ट नहीं होते हैं★

आपने संसार के सभी जीवों को दुख से बचने के लिए अनेक प्रकार के उपाय करते देखा होगा

जहां भी आपस में झगड़ा होता हो , वहां एक बात निश्चित रूप से आप गौर करके देखिएगा कि उन दो में से एक व्यक्ति बिल्कुल सही होगा , एक व्यक्ति उस सही को सही मान ही नहीं रहा होगा ।

जो बलवान होगा , प्रायः वही गलत होता है । अपने से छोटे निर्बल को अपनी बात मनवाने में बहुत जोर देकर कहता मिलेगा ।

मजे की बात तो यह है कि सभी लोग बलवान को समझाते हुए निर्बल को ही गलत कहते होंगे ।

इस संसार में ताकतवर ही दुख देता है , यही सिद्धांत है ।
स्त्री बलवान होगी तो पुरुषों को दुखी करेगी, और यदि पुरुष बलवान हुआ तो स्त्री को दुख देगा । यही सृष्टि में होता आया है और होता रहेगा ।

पशु पक्षी हों या मनुष्य , देवता गन्धर्व आदि श्रेष्ठ योनियों के जीव हों ।

हमेशा ही कमजोर आदमी को ही सही होने पर भी हार मानना पड़ती है ।

भागवत के चौथे स्कन्ध के 29 वें अध्याय के 33 वें श्लोक में नारद जी ने दक्षप्रजापति के पुत्रों से कहा कि —

यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन् ।
तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रिया ।।

हे दक्षपुत्रो ! संसार के शारीरिक और मानसिक दुख कभी भी किसी भी उम्र में किसी भी उपाय से स्थायीरूप से नष्ट नहीं होते हैं ।

दुख तो शिर में रखे हुए भार के समान है । जैसे – शिर में रखे हुए भार को आदमी , शिर से उठाकर कंधे में रख लेता है ।

जब कंधा दर्द करने लगता है तो फिर से शिर में रख लेता है । कंधे से शिर में और शिर से कंधे में भार को बदलता रहता है ।

लेकिन भार तो जितना है , उतना ही रहता है , फिर भी ढोनेवाले को राहत मिलती है । वही शरीर वही भार रहता है ।

उसी प्रकार स्त्री पुरुषों का दुख है । कोई एक बात को लेकर झगड़ा हुआ , और फिर दूसरे दिन फिर किसी और बात को लेकर विवाद होने लगा ।

पहला विवाद का प्रसंग भूल गए , दूसरा खड़ा कर लिया । न स्वयं कुछ सुख ले पाए, और न ही अपनों को दे पाए ।

अपनी बुद्धि से कुछ का कुछ सोच लिया, और दुखी होने लगे । उसी संदेहास्पद विचार को लेकर उसी को दुखी करने लगते हैं , जिससे सुख मिलना है ।

अब सोचने लायक है कि आप को जिससे सुख मिलना है , उसी को आप अपने विचारों से , आचरणों से दुखी कर देते हैं , तो अब आपको कौन है दुनियां में जो सुखी कर देगा ?

ऐसी स्थिति में , न तो आप कभी सुख का अनुभव कर सकते हैं , और न ही आप किसी को सुख दे सकते हैं ।

दुख दूर करने के जितने भी उपाय करेंगे , उन उपायों को करने का भी एक नया दुख उठाना पड़ेगा । वह पहला वाला तो दुख दूर होगा नहीं , और दूसरा नया दुख और जुड़ जाएगा ।

शिर के भार को जब कंधे पर रखेंगे तो , भार तो उतना ही रहेगा , बस, थोड़ी देर के लिए शिर हलका होने लगेगा ।

लेकिन जो दर्द शिर में रखने से हो रहा था , वही दर्द तो थोड़ी देर बाद कंधे में होनेवाला है ।

अर्थात जब तक भार और शरीर का संयोग रहेगा , तब तक दुख और दर्द तो रहना ही है ।

अर्थात – परिवार ,समाज, सरकार का दुख आपके शिर में रखा हुआ है । आप स्थान बदल सकते हैं , व्यक्ति बदल सकते हैं , काम बदल सकते हैं , कुछ भी बदल सकते हैं , लेकिन दुख तो वही रहेगा और वहीं रहेगा ।

जैसे कि कोई सोचता है कि यह स्त्री ठीक नहीं है । दूसरी लाऊंगा , तो ठीक रहेगा । लेकिन उसके यह समझ में नहीं आता है कि लाओगे तो स्त्री ही । जैसी वह थी , वैसी ही तो यह भी होगी ।

ऐसे ही कोई स्त्री पुरुष बदलने की सोचती हैं , लेकिन आएगा तो पुरुष ही । वह भी वही बोलेगा ,और करेगा ।

किराए के मकान में रहनेवाला परिवार मकान और मकान मालिक कितने भी बदल ले , लेकिन किराए के मकान से होनेवाला दुख कैसे दूर हो जाएगा ।

मेरी जब उम्र 8 वर्ष की थी , तब हमारी माता जी ने इस धराधाम को छोड़ दिया था ।

1975 का समय था कि न तो आजकल जैसी बिजली , रोड और साधन थे और न ही कोई विशेष पढ़ा लिखा मनुष्य ।

मैंने माँ की तेरहवीं में लोगों की भारी भीड़ देखी थी । फिर चौमासे के मेढकों जैसे जाने कहां सब वे चले गए , जो हमारे दुख से दुखी थे । रो रहे थे ।

हमारे और पिता जी के अलावा और कोई इस दुख को सहने के लिए नहीं था । हमें तो संसार के संबन्धों से ऐसा वैराग्य हुआ कि आज तक न तो किसी के मरने में , और न ही किसी के विवाह या जन्म में ही गए हैं ।

मात्र पिता जी के जानेपर ही पहली बार और अंतिम बार में गयी थी ।

जब हमारा दुख हमें ही भोगना पड़ता है , तो ऐसे कंधे बदलने से क्या होगा ? कोई जो दुख आज दे रहा है , वही दुख संसार के सभी लोग देंगे ।

इसलिए यह बात दिमाग में निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि जब तक हमारा जीवन है , तब तक दुख तो निश्चित ही है ।

थोड़ा सा जो कोई हंसकर बोल देता है तो समझो कि कंधा ही बदला है , भार बजन तो वही है । जो थोड़ा सा सुख दे रहा है , वह भी सुख से हजार गुना अधिक दुख भी देता रहता है । कभी अपने विचारों से , तो कभी अपने आचरण से ।

बस , इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि आप सदा ही सही नहीं सोचते हैं और न ही सदा ही सही करते हैं ।

सामने वाला व्यक्ति जब तक सह सकता है , उतना ही सह सकता है । संसार में जीने के लिए बल से अधिक बुद्धि की आवश्यकता है । अपना विवेक , अपना सुख । अपना अविवेक , अपना दुख ।

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