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30 अप्रैल… कहा गए वो दिन

Byadmin

May 1, 2021

30 अप्रैल… कहा गए वो दिन

(80 के दशक तक की पीढी के लिए…)

30 अप्रैल तक का दिन अति महत्वपूर्ण हुआ करता था..
मां सुबह से उठा देती थी…
दो तीन दिन पहले से मोहल्ले में परिवारों में बच्चों में सुगबुगाहट और बेचैनी चालू हो जाया करती थी…
देवालयों में माथा टेकना मन्नतें मांगना चालू हो जाता था
बालमन में मेहनत से ज्यादा भगवान पर भरोसा जाग जाया करता था..
नहा धोकर लाल ताजा फूल लेकर घर के भगवान को फूल चढा दो अगरबत्तियां जला मन ही मन कुछ पाने की बुदबुदाहट…. मानो मेहनत का नतीजा नहीं भगवान से की गई अंतिम प्रार्थना सारे नतीजे उलटफेर कर देगी…
जिसका पर्चा बिगडा था वो पास होने की मन्नत…. जिसको थर्ड डिवीजन के लायक पर्चा बना वो सेकंड डिवीजन की उम्मीद के साथ… जो फर्स्ट डिवीजन वाला है वो मेरिट या पोजीशन की उम्मीद के साथ प्रार्थनारत् रहते हुए सुबह 7:00 बजे शाला पहुंचता था… सालभर शरारतें औ बदमाशियां करनेवाला भी अनुशासित ढंग से राजा बेटा बनकर क्लास में बैठता था गुरुजी का इंतजार करते…
गुरुजी का कक्षा प्रवेश होते ही सालभर चिल्ल पों मचानेवाले जाहिर है मैं भी.. एकदम सुई पटक सन्नाटे (पिन ड्रॉप साइलेंस) के साथ सांस रोके नाम पुकारने और रिजल्ट लेने को बेताब अपने नाम की बांट जोहते थे… एक के बाद एक कुछ चेहरे रिजल्ट लेने के बाद खिल उठते तो कुछ मायूस हुआ करते थे…
उधर घर पर जो भी सदस्य रहते थे सारे काम छोड” युद्ध पर” गये वीर का फतह कर वापसी का इंतजार करत रहते थे… अगले क्लास जाने और बडे होने का रुआब लिए दोस्तों से मटरगश्ती कर घर वापिस आते थे… घर पर… और अच्छे नंबर लाने की नसीहतें… मस्ढती कम करने… पढाई पर ध्यान देने के प्रवचन होते थे… यह भी कहा जाता था कि…. हम तो कुछ नहीं कर पाए… तुम्हारे पास अभी समय है… फलां को देखो… घर के काम…. व्यापार में बाप का हाथ बंटाता है फिर भी कितने अच्छे नंबरों से पास होता है.. मोहल्ले के बिगडैल लडकों के साथ मत खेला करो…. रेम खेलना पत्थर गिरौला खेलना खिला गडउल खेलना रेस टीप खेलना काम नहीं आनेवाला….
लगभग घंटे डेढ घंटों की नसीहत के बाद मां अपने लाल के मायूस चेहरे को देख सबको शांत करती थी फिर मिठाई मंगवा भगवान को भोग लगाया जाता था और हमारे कसैले से हो चुके मूड को मिठाई से मीठा किया जाता था
तुर्रा ये कि अगले दिन से दो महिने की भरपूर छुट्टियों का आनंद न उठावे इसका बंदोबस्त पहले से हो जाता था…. बच्चे को पेंटिंग या संगीत क्लास में डालने के अलावा घर का एकाध छुट्टियों से जलनखोर सदस्य अगले साल की एक दो किताबें भी ला देता था कि इसको दो महिने में थोडा थोडा पढते रहो अगले साल कठिनाई नहीं होगी…
कुल मिलाकर 30 अप्रैल का दिन हर साल एक टर्निंग पॉइंट होता था जिंदगी का…

कहां गये वो दिन? आज की पीढी को 30 अप्रैल का वह मर्म नहीं मालूम

विभा

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